अनमोल है व पल

जीबन की जमुना नदी में कितने लहरे खेलता ये किसे पता दोस्तों। सहज है नहीं बिलकुल असंभब सा बात। कभी ठहरता नहीं। ऐसे ही एक अस्त ब्यस्त पागलपन कि मरीज बनके दौड़ता रहता हमेसा इधर उधर ये उसे ही पता नहीं रहता बास्तब में इसका क्या है यथार्तता। असली जीबन में भी आजाता ऐसे कुछ पल कभी अबांछित रूप में। ठीक अनुरूप जैसे बारिश की ऋतु में अपनी आप होता रहता बारिश। सारे ओर नजर आता पानी ही पानी जिसकी शुभाषिर -बाद पुर्बक धरा हो उठता उत्फुल्लित। उनकी कभीसे स्थित अंदर की दुःख ,संतापित सुप्त जीबन में आजाता एक ऐसा समय जो उनकी मनकी सारे आबिलता को एक ही पल में दुरिभूत करके रूपांतरित करदेता सूखकर समय में।

धरती को सजादेता एक नबजुबा सुंदरी सुकुमारी रूप में। सुसज्जित करके लेआता नबकान्ति। इज्वलता लेआता अंग अंग में भरदेता उन्मादना। असुमारी आशा की समुंदर में तेहरनेको उनकी मन में लेआता उत्सुकता। भरदेता एक नूतन अभीप्सा। कुछ नूतनता लाने को अपनी जीबन और परिबेश में। परिबेश को ही करनेको सुंदर और सुरोभित।

ये सारे बातें है नहीं किसीकी बस की। सबकुछ समय का खेल। कुछ ऐसे बिशेष मुहूर्त या बेला का अबदान। कभी कभी समय की रिमझिम बारिश में पड़ते हैं बूंदें मधुरता का। जिसे पिनेकेलिये मनमें आता प्रबल उत्सुकता। जब में उसे पिलेता मनमें रखके ऐसे कुछ आशा की सारे तृष्ना की करलूं अंत ये है एक अपूर्ब मौका। पिताजाता पिताजाता व मधुर सुधा को जीभर। आस्वस्ति आजाता सेहद में। समूर्ण संतुष्टि मिलजाता अंतर को और फिर व बारिश चलाजाता कहीं पे पता नहीं जिसे में आज भी ढूंढता रहता हूँ। खोजता रहता हूं व मधुर मुहूर्त को गाकर गीत प्रेमकी नाहीं बिरहकी जो स्वर झंकार में सजतेहुए बनजाता एक कबिता अनमोल है व पल जिसकी नाम:

अनमोल है व पल

बाताबरण है काफी शांत
स्निग्ध अति मनोहर
जिस रास्ते में मेरे प्रेमिका
जाता युहीं अक्सर
हाथ में एक आमोद भरा
प्रेमकी गुलाप लेकर
निहारता हूं झांकता हूं
मेरा जाता है नजर बार बार
कियूं की आज करना है मुझे
मेरे प्यार को इज़्हार ।।

कुछ क्षण उपरांत में
व चंद्र बदना मृगनयना
जब आगई मेरे पास में
में तोल दिया मेरे दिलकी
प्रेम गोलाब को उसीकी
उसकी सुकोमल हाथ में।।


अनमोल है व पल




मेरे प्यार को स्वीकार करली
अपनी स्मित हासी गोलाबी
होंठ से ये स्वस्प्ट नजर आती
व काफी शतुस्ट लग रहीथी
बदन की सल्लजता कहतिथि
ये अजिब सी एक पल थी
जब गुलाब हँसता, बहकी
समीरण खिलता चमन में
तीतिलियां घूमते फूलों में
फिर कोयल भी गाते मधुबन में
ऐसे एक पल में हम दोनों ही
रखते निरबता भाषा में
मगर जीभर के बातें करते
दिलकी भावनात्मक भाषा मे।।

चारों ओर कयाकुछ हो रहा है
बिलकूल नहीं रहता था पता
प्रेम में उतना ही था मग्नता
कोई कुछ पूछते नहीं देखता
अनमोल है व पल मैं कैसे भूलता।।




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