मैं हूं व मुक्त बिहंग

मैं हूं व मुक्त बिहंग


गति शीलता जीबन की प्रकृति है दोस्तों। जब तक पिंड में प्राण का रहता सत्ता व हमेसा भागता जाता भागता जाता रखके समय की गतिमें निरब छिन्नता। अवि -श्रान्त खोज करता जाता बेहतर स्थिति का। अपनी गति पथमे उसे सामना करना पड़ता अनेक परिस्थितियों से,सम -योजन करना पड़ता उसको। अपनी समझदारी तथा ज्यान को पाथेय करके व समस्याओं को समाधान करने के लिए आगे बढ़ता। चलाता अपना प्रचेस्टा मगर हर बार मिलता नहीं सफलता कभी कबार मिलता भी विफलता।

जब विफलता का सामना होता


जब कभी व विफलता की चपेट में आजाता कुछ मुहूर्त के लिए बनसकता निराशा बादी। ऐसी एक स्थिति में भावना में देखनेको मिलता कुछ भावनाओं में भिन्नता। कभी क्रोध ग्रसित होता तो फिर कभी नकररात्मकता आजाता। उसी वक्त कर नहीं पाता उचित अनुचित का बिचार। हरा बसता अपनी आप पर बिस्वास। स्वीकार करने लगता भगवान का अबस्थिति। होने को चाहता सरणा -गत। पानेको चाहता सान्निध्य। व होजाता शांति कामी। समझना चाहता जिबन कि गुढ़ रहस्य को और व होजाता एक कबिता मैं एक मुक्त बिहंग।


मैं हूं व मुक्त बिहंग


मैं हूं व मुक्त बिहंग


मैं हूं व मुक्त बिहंग
नभ का मैं हूं अंतरंग
प्रतिस्पर्धा मेरा आकाश की संग
मगर अबशोस अब काटी पतंग ।।

अब बिल्ली और कुत्तों से डर
कटी पतंग से रक्त बहता झर झर
अब एक पंख का क्या है काम
कटा देता हूं होजाएगी बराबर ।।

आखिर ऐसा भी एक दिन आएगा
कभी मेरा भावना नहीं था
एक बालक की खेलना बना पतंग
मेरे उड़ता हुआ पंख काट जाएगा ।।

ओह, काहांसे आया वेसा एक दुर्दिन
सबकुछ बना दिया सर्मसार मूल हीन
बनादिया दुर्बल बना दिया श्रीहीन
मैं अब कैसे लगूंगी पंख बिहीन ।।

वाकई मैं आज मर्माहत मेरा पंख नहीं
अब रोनेका क्या काम फिर किसीको
दोष देनेका अबकास मन भी कहीं
लाभ क्या बिताना अबसाद पूर्ण जिबन
बेहतर होगा जपना होगा हरि का नाम।।

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