मैं बेचैन हूं.....
मैं बेचैन हूं
जिंदगी में कुछ ऐसी समय कभी आजाता जिसे भूलना अत्यंत कठिन होता दोस्तों। कभी कबार नामुमकिन सा बनजाता। जब मेहसूस होता इसकी एहमियत तब उत्त्पन्न होता इसको पानेके प्रति ब्यग्रता और जब मिलजाता तो सलामत रखनेकी जिम्मेदारी की प्रति प्रतिबद्धता।
प्रेम को हम जब भूलना नहीं चाहते
जब मन में आजाता व सारे बीते हुए बातें जो हम बिताए थे प्रेम की माहोलमें। मन में जगाता नई आशा और उसुक्ता। व अनमोल पल का अनमोल बातें जो हम लोग कर रहेथे आपस में।
बार बार करता जाता अभिप्रेरीत। जिसे हम कभी भूलना नहीं चाहते। खोना नहीं चाहते प्रेम को किसी भी हालत में। आजके लिए नहीं हमेसा के लिए अपनि पास रखने को कोशिश करते हैं और ऐसे बन जाता एक कबिता नाम लेता मैं बेचैन हूं.....
मैं बेचैन हूं.....
दिबश की प्रथम चरण में
जब भ्रमर गण थे बेहाल में
फूलों के साथ ब्यस्त थे खेलमें
अपनी अपनी पूर्ण प्रेम बंधन में
मैं झांकते हुए झाँकलिया
बगलकी रास्ते में जो था
उद्यान की बिल्कुल निकट में
देखा और एकदम चौंकगेया
जानते हो कियूं ? व मेरा प्यार
आरही थी उसी ही रास्ते में!!
कोमल सीतल अरुणिमा पडता
उनकी मुहूं में थोड़ीसी हंसी था
होंठ में और सोना जैसी चमक था
तन और बदन में सोभा का तुलना
नहीं किसी भी प्रकार का उदाहरण में!!
तटनी जैसी काला पिच पिच रास्ता की
कड में व अकेले चलरही थी गजगमनी
चाल में कभी देख रहीथी इधर उधर
अपनी मृग नयनी चतुरंगी चहानी में!!
देखकर स्पंदन बढनेलगा हृद में
क्या कुछ भावना आता जाता मन में
याद में आजाता व कुछ बितेहुए पल
जो हम गवाए थे प्रेम की खोज में!!
बन में उपबन में मंदिर में
पाठशाला में बाजारों में खेतखलिहान में
पर्ब परबानी आश पडोश फिर दोस्ती में
कहां कहां नहीं खोजा प्रेम तुम्हे मैं ?
जब अब तुम मिल गइहो पास में
मैं बेचैन हूं तुम्हे पाने में तुम्हे अब मैं
हराना नहीं चाहता किसी हाल में
तुम्हे हर पल रखना होगा पास साथ में!!

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