जो है जिम्मेदारी

जो है जिम्मेदारी

जिंदगी की राहों में कर्म का कभी होता नहीं अंत। जिबन होता हमेसा कर्म अनुरागी। लेता स्वरूप एक भिन्न अर्थ तब कहलाता कर्म बनजाता भगबान लेता भगबान का स्थान मगर एक बात सारे कर्म इस में सम्मिलित नहीं होती। व सारे सुद्ध,चैत्य,स्पटीक तथा निर्मल जो किसीकी आत्मा या कीसी ओर की उपकारी बनती उसे कहाजाता उचित कर्म तथा सत कर्म। कुछ लोग इसे अपनी जिबन में आभूषण बनालेते। अपना पराकाष्ठा और साधना की माध्यम में। अपना आत्मा और जगत कल्याण का भावना रखके बनालेते अपनी जिबन को सतकर्म की ब्रती।

करता जाता संघर्ष

करता जाता संघर्ष दुराचारी और कलुषित आस्था तथा बिचार धारा की बिरुद्ध। कभी बन भी जाता शिकार भ्रष्ट तत्व की भ्रष्ट कलुषित परंपराओं से मगर ये बिस्वकल्याण की दृश्टिकोण से देखा जाए तो एक बहत बड़ा चिंताकी बिसय है ही। जिसकी अंत इंशानियत की अंत ही। इसीलिए इंशानियत को बढ़ावा देना ही होगा,जो है जिम्मेदारी हर इंसान की राजा से लेके रंक की।


जो है जिम्मेदारी


जो है जिम्मेदारी


जिबन में ज्यान का
उतना ही एहमियत होता
अंधकार में प्रकाश का
जितिना रहता आबश्यकता !!

एक ज्यान रहित जिबन
है ही पाशविकता पूर्ण
होता नहीं कोई अनुशीलन
उचित अनुचित का मूल्यांकन
करता जाता कुछभी चाहे मन
अपना सुख शांति केवल चिंतन
दूसरों की कोई रहता नहीं अनुचिंतन
न कोई आत्म बोध का कोई ज्यान
न रहता कोई बिबेकशील आचरण
केवल भोगबादी  चलता एक जिबन
हमेसा रहता एक ही मकसत मन ही मन
अपना प्रतिष्ठा मान सम्मान रहता स्वअहं
जो कुछ और नहीं होता अर्थ मूल्य हीन!!

ऐसी एक संकोचित भावना
कैसे होगा ज्यान में परिगणना
इसी से न होगा किसी की उत्थान
या कोई सामाजिक समस्या का समाधान
केवल करता जाता मानबिकता का हनन
ऐसा धारणा केवल करता जाता बदनाम
इंशानियत की परिभाषा में लाता कुछ  भीन्न एक अर्थ जो लगता नहीं समीचीन!

होके इतनी सारी अपगुनकी अधिकारी
जब ये एक भ्रस्ट ब्यबस्था होता महामारी
फैलता जाता संसार को बनाता दुराचारी प्रतिहत करना इंशानियत का जिम्मेदारी
मन बचन कायिक बाचीक समर्थन जरुरी
देना पड़ेगा कबर ये बिचार जोहे बीमारी
इंसानीयतको बचाना है जो है जिम्मेदारी!


इंसानीयतको बचाना है





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