प्रेम गुरु
प्रेम गुरु
प्रेम जो दो अक्ष्यर जीबन में बड़ाही माएने रखता है दोस्तों। ये प्रेम में होता कैसा एक अपूर्ब रस पता नहीं। मिराको बनालेता पगलि। मीरा भूल जाती अपनी आपको। करदेता अपनि आपको उस्सर्गिकृत। दिन रात मुख में बोलता जाता केवल कृष्ण का नाम। एकीभूत होनेका इच्छा को जाग्रत करता। मीरा को बाबरी बनादेता। व अपनी आपको सम्पूर्ण रुप से भुलजाता।
ये मन भी कितिना बेचैन
लेआता भावनाओं को बनादेता
सामुद्रिक स्रोत को करता आंदोलित
समुन्दरकी विशाल जलराशि जैसी मन
अथय होता इधरउधर करता धाबमान!!
जब प्रलयंकारी भयानक तूफान
मिलजाता जल में घोर घर्घर नाद में
समुंदरकी छाती अपनी आप फुलजाता
निकल आता बाढ़ जैसी स्रवित पसीने
बदल जाता आकाश फटा बारिश में
मन भी समीर जैसी अथय चित्त में
फुफुकार स्वर में उतार देता सीने में!!
अब जी चाहता करने को कुछ और है
क्या मैं चढ़ जाऊं कोई मन जान में
जो मुझे लेजाएगा निशब्द एक क्षयन में
पहंच जाऊं मैं मेरा वही प्रेम की देश में
मैं मिलजाऊँ मेरा व प्रेम की नगरी में!!
फिर भावना के तेहत बनता ऐसा हाल
समुन्दरकी उत्तुंग तमाल आता माल माल
उमंगे बेबस करते साथ कुछ लेने को
मैं ये तय कर नहीं पाता कौन सा मैं लूँ
कौनसा सहीहोगा गुलाब या फिर कमल!
पड़ जाता मैं झील की उलझन में
गुलाब लूँ तो ठहरना होगा मुझे वहीं
प्रेम नगर की झनझटवाले माहौल में
कमल लूँ तो सास बहुकि प्रेमकी बस्ती में
जिबन का बास्तविक रिस्तेकि दामन में!
मनअब ठहरता नहीं कहांजाऊं क्या करूँ
क्या मैं प्रेमगुरु को बुलाऊँ या पास जाऊं
ठीक है प्रेम गुरु में हीं तुम्हारे पास आऊं
बताइए मुझे मेरे प्रेम गुरु अब मैं क्हां जाऊं अब मैं क्या करूँ.. ?
अनंत रूपी प्रेम
ये प्रेम का अनंत रूप रहता। कलना करना असंभब ही नहीं है नामुमकिन सा। इसकी आकर भी अनंत। छाया रहता सम्पूर्ण जगत में। इसकी स्वयं सम्पूर्ण रूप एकदम स्वच्छ,निर्बिकार और आनंद ही आनंद मगर जब कहीं इसमें रहता कोई छलना,अबिस्वास और सठता प्रेम तब लेता अपना ही कलुषित रूप और दिखाता कलुषित प्रतिछवि। बनता मर्मांतग,भयानक। बन जाता दोषी किसीकी नजर में।
प्रेम है आनंद का उस्स
बास्तब में इसी पार्थिब जगत में प्रेम से ही मिलता प्रकृत आनंद। बास्तविक सुख और समृद्धि का मधुर झरण है ये प्रेम। प्रेम ही सत्य,शिब, सुंदर का स्वरूप है। जिबन जिनेकी एक कला है प्रेम। गुरु से लेने वाला एक दिक्षया है प्रेम। इसीलिए प्रेमकी कला को शिक्षया करके अपनी जिबन को सार्थक बनाना हरकिसी के लिए एक उपयोगी ज्यान प्रासंगिक है ही।
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प्रेम है आनंद का उस्स |
प्रेम गुरु
ये मन भी कितिना बेचैन
लेआता भावनाओं को बनादेता
सामुद्रिक स्रोत को करता आंदोलित
समुन्दरकी विशाल जलराशि जैसी मन
अथय होता इधरउधर करता धाबमान!!
जब प्रलयंकारी भयानक तूफान
मिलजाता जल में घोर घर्घर नाद में
समुंदरकी छाती अपनी आप फुलजाता
निकल आता बाढ़ जैसी स्रवित पसीने
बदल जाता आकाश फटा बारिश में
मन भी समीर जैसी अथय चित्त में
फुफुकार स्वर में उतार देता सीने में!!
अब जी चाहता करने को कुछ और है
क्या मैं चढ़ जाऊं कोई मन जान में
जो मुझे लेजाएगा निशब्द एक क्षयन में
पहंच जाऊं मैं मेरा वही प्रेम की देश में
मैं मिलजाऊँ मेरा व प्रेम की नगरी में!!
फिर भावना के तेहत बनता ऐसा हाल
समुन्दरकी उत्तुंग तमाल आता माल माल
उमंगे बेबस करते साथ कुछ लेने को
मैं ये तय कर नहीं पाता कौन सा मैं लूँ
कौनसा सहीहोगा गुलाब या फिर कमल!
पड़ जाता मैं झील की उलझन में
गुलाब लूँ तो ठहरना होगा मुझे वहीं
प्रेम नगर की झनझटवाले माहौल में
कमल लूँ तो सास बहुकि प्रेमकी बस्ती में
जिबन का बास्तविक रिस्तेकि दामन में!
मनअब ठहरता नहीं कहांजाऊं क्या करूँ
क्या मैं प्रेमगुरु को बुलाऊँ या पास जाऊं
ठीक है प्रेम गुरु में हीं तुम्हारे पास आऊं
बताइए मुझे मेरे प्रेम गुरु अब मैं क्हां जाऊं अब मैं क्या करूँ.. ?
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प्रेम गुरु |


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