माँ .....



माँ .....


माँ हर जिबनकी हे व पबित्र नाम जिसकी और हे नहीं कोई बिकल्प या उपमा I
माँ अपनिआप एक पबित्र पयोनिधि मैया गंगाकी सामान I तटनी जैसे हमेसा करती ही जाती औरों पे एहेसान I कभी भी व अपनेलिए नहीं जीती I हमेसा औरों के लिए जीती I उशकी बलिदान असाधारण है I बास्तबिक हे अतुलनीय I आपनी सन्तान संततियों के प्रति उसकी अनाबिल ममता को कभी भुला जानहिं सकता I हमेसा किसी औरोंके प्रति दिखाती हमेसा उस्सर्गिकृत मनोब्रुत्तियाँ I उसकी कितना भी गालोगुण गरिमा कम है I वहे महीयसी महीयान I मेरी माँ I



माँ .....
माँ .....


माँ होते हें जीबन दायिनी I माँ की कितना हे महिमा मुसकिल हे बखानना I जिनकी पावन सान्निध्य बिना जीबन की नहीं रहता कोई अदि अंत सम्भावना I
व धरती स्वरूपी सहानुभुतिकी मुर्तिबंत प्रतिमा I हमेसा बांटता ही जाता दया, क्ष्यमा I सिखाती जगत और जिबन की रीती I जिसको पाथेय परबर्ती जीबन में जीबन पकडलेता बिकास की मार्ग I आपनी आप बनता महान मगर व सारे ही किसीकी हे प्रतक्ष्य अबदान व और कोई हे नहीं सिबाय माँ I बास्ताब में बुलाया कभी जानहिं सकता उसकी एहेसान I हम तो छुका नहीं पाएंगे उसकी रुण I आइए करलें माँ की सम्मान I



माँ .....

आज केसे करूं में
माँ की बंदन
जो दिया मुझको
जीबन दान
उत्सर्ग किया व अपनी सबकुछ
उसकी महिमा हे महान !!

धरती जैसी हे सेहन शील
दिया है मुझको व खान पान
आपनी ही बक्ष से दूध पिलाया
बचाया जो मेरा जीबन जान !!

आंखो में जिसकी सिर्प मैं हीं हूं
उसकी  बड़ा में हूं धन 
उसकी प्यारी इसी संसार में
मेरे सिबा और होता कौन !!

मेरे रोमरोम में अंकित जिसकी
तनमन जीबन की बलिदान
में कैसे भूलूं भी उसकी महिमा
जानता व क्याहै उपादान !!

माँ की नाम का नहीं उपमा
व तो अनुपम स्वर्ग समान  
पावंकी उसकी कहां तुलना
पावन हे एक तीर्थ स्थान !!

आज में करता संगीत मूर्छना
प्रचार करता व एहेसान
माँ तुम मेरे जिबन कल्पब्रिक्ष
ग्रहण करलो मेरा प्रणाम !!


  


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