कबिता


कबिता कबिमनकी व सारे परिकल्पना जो अपनिआप अक्षयर की रूप लेकर निसृत होजाता कबी कलम से बनकर कबिता I अपनी मनोबैज्यानिक स्थितिके अनुसार कबी की हृद्से निकलता भावनाएं जो किसी औरको प्रभाबित करता I परिबर्तंकी एक स्रोत बनजाता कभी किसीके जीबन में लाता परिबर्तन तो कभी सम्पूर्ण परिबेश में लाता हिल्लोल I कभी मानशिक चाप को करता दूर I दिलाता दुखी मन को शान्ति I कबी लेखनी तथा कौसल में रहता व चातुरी जो किसीको कितिना करता प्रभाबित निर्णय करता उत्कर्षता I कोई एक भावना को शाब्दिक रूप देकर सही भावको लाना बिलकुल भी एक सहज प्रक्रिया हे नहीं I जरुरत पड़ता अध्यबसायकी I कबिकी रूचि और अनुचिंतन की I उसकी धारणा और ध्यान की I

कभी कबिता कबीकी कलम में होता चित्रित लेता प्रिया का रूप तो कभी फिर लेता दोस्त,भाई,भक्ति,प्रेम,स्नेह,देश भक्ति की स्रोत जो अपनिआप बनता एक नदि जैसे धारा बहता जाता निरंतर I कबिता कभी कबी में भरता व उन्मादना जो कभी बनता भी उसका निसा I व हमेसा करता आपनी कबिता को प्रेम I सजाता अपनी पसंद अनुसार भिन्न भिन्न  आक्श्यरिक पुष्प और चमकदार कपड़ोंसे I इसी से कबिता लेती एक उरबसी जैसी रूप I बनता एक कबिता जिसका नाम हे ये कबिता I



कबिता
कबिता





कबिता

कबिता मेरे
प्रियतमा भावना
इसकी हे नहीं उपमा
जो परिब्याप्त त्रिभुबन
मगर इन्हां कुछ हे गड़बड़ी
कारण सिमित हे मेरा अनुचिंतन !!

हमेसा घूमता इधर उधर
भीतर भी उतनाही सुन्दर
वही मुखड़ा चांदकी तुकुड़ा
गहरी आँखें काजलकी धार
मुकुलित केश खेलता लहर
मृदु पदगतिसे उड़ाता समीर
छूटता सुगंध समय समय पर
भ्रमरको उत्फुल्लित करता बारबार !!

करता इंगित कहता व भ्रमर
आओ मेरे भावनाओंके राजकुमार
कबसे मेरादिल धुन्ड़ता हे बेक़रार
पानेको तुमसे व प्रितकी पाराबार
मैं चाहाता हूं करने को साकार
सारे जिबन के इच्छाएं जो निरंतर
आकर्षित होतेजाते अपनिआप निकर
प्रकृतिकी पाठशाला से होता गोचर
की तुम्हारे और मेरेमें हे कुछ अंतर !!

तुम फूल हो चहटाते बास जैसी इत्र
सभी को शान्ति देतेहो आघ्राण बनकर
सभीके प्राणकी तुमहो पयोनिधि पयोधर
तुमभी अतृप्त असम्पूर्ण अकेली बनकर
आओ परिबेशको सुसोभित करलें दोनों मिलकर !!

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