मरना भी मना
मरना भी मना
जन्म और मृत्यु जिबंका दो ध्रुब सत्य हे दोस्तों I जन्म हे
तो मौत भी अनिबार्य हे I ये एक नियम सभीके लिए सामान होता व चाहे कोई नर या होता
देबता I सबिको एक न एक दिन अपनी पार्थिब शारीर को छोड़ना ही पड़ता I इसे आम तोर पर
मौत ही कहा जाता मगर जिब आत्माका न कभी होता मौत ये हमेसा के लिए होता अजर अमर I
जिबन की मकसद
हर जिब इन्हां लेता अपना जन्म करनेको कुछ कर्म I बनाने को
जीबनको महत और पबित्र Iहर जिब अपनी आपको बनाना चाहता एकीभूत व परम सत्य के साथ जो
ये सारे जगतका रचयिता ,मालिक और नाथ I यही एक अभिलाषा को चरितार्थ करनेके लिए व
अपना लेता भक्ति और प्रेमका मार्ग जो
स्वरुप में होता निर्गुण,अंतहीन,निराकार कारण नहीं चाहता इन्हां लेनेको बार बार
जन्म I छुटकारा चाहता जन्म मृत्यु की चक्र से I बनजाता सत पथ की यात्री इच्छता मोक्ष्य
I ऐसे में व अपनी आपको बनालेता जगत का हिस्सा और जगतको भी बनालेता अपना परिबार I
मनमें रखके बसुधेइबम कुटुम्बकं की महा मंत्र I
भावना जो मरने नहीं देता
उनकी अन्दर स्थित प्रगाढ़ आत्मबत अनुचिंता उसको औरों के सुख
दुख के कारण प्रभाबित होता I खासकर वे
सारे आत्माएं जो उनकी साथ संस्लिस्ट रहते I एक आत्मा शारीर भिन्न की मनोभाव उसे
महसूस कराता वे सारे अपूर्ब और महान अनुभूति जो उसे कभी मरने नहीं देता साथ ही ऐसे
एक नित्य परिकल्पनाको लेके कबी कलमसे रूप लेता एक कबिता का जिसकी नाम हे मरना भी
मना I
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| मरना भी मना |
मरना भी मना
कमल जैसी सूरत तेरी
गोरा गोरा गाल
उत्तंग कपोल में
सितारा चमके
काला काला बाल
करे बुरा मेरा हाल !!
इसमें तुम्हरा दोष कहाँ जी
बीतता जाता साल
अथय बनता मन बाबरा
कटता नहीं पल
सचमुच होता एसा हाल
रहता द्विधा मानता नहीं
प्यार में मारा दिल
अब मरना भी मुस्किल !!
चाँद जैसी मुखुड़ा तेरी
होंठ लाल लाल
हाय हाय नजरें भी कमाल
सागर जैसी गहरी आँखें
उमंगें माल माल !!
दिलकी अरमा दिलमे मरता
ये भी एक बदनाम
ओ गोरी मन भी बेईमान
किसीकी कहा मानता काहाँ
रहता ही बातुल
हाँ हाँ एसा हे बिलकुल !!
तेरी चेहेरा हे व चन्दन
सुन ज़रा मेरे मान धन
जलता रहता तन मन मेरा
तेरी दिलको ही बंदन
रखलो कुछ सम्मान
ऐसे घडी बने अब काल !!

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