मन की गाथा


मन की गाथा


जीबन बास्तब में एक स्मृतिकी पिरामिड हे दोस्तों I चिर चंचलमयी जीबन में हमेसा घटी होते जाते बहत सारे घटनाएं I इनमेसे कुछके होता जीबन में मायेना रहजाते बनके स्मृति मनमे हमेसाके लिए जिबनमे I ये सारे हमारेलिए लाते अशरन्ति जानकारी ,प्रदान करते अनुभूति बढाते जाते हमारे में य्जानकि परिसर जिसकी बलपर हम जिबनको करपाते सुमार्ग में परिचालित I लक्ष्ह्याभिमुखी बनाके साक्ष्यं बनाता जिबनको करने में साफल्य मंडित I व सारे स्मृति परबर्ती स्तिति में बनके अनुभूति जैसी दार्शनिक जिबनको दिखाताजाता सही मार्ग करताजाता सही दिशा में परिचालित I


अभुला स्मृति की व अनुभूति


सारे अनुभूति हमेसा नहीं देता सुखद अनुभूति I कुछ में रहता भी कडवाहट मगर होते बड़ा कामकी चीज I कभी कभी जिबंमे जब आजाता ऐसे भी परिस्थिति जहां मिलता एसा भी मौके जीबन को जीभर जिनेको I इन्हां जिक्र किया जासक्ता बाल समयका I बासिश में भिगनेकी व अनुभुतिका I कागज़ नौका को बारीशकी निर्झरिणी में तैरानेकी I बारिश में भीगने की और गीली मिट्टी में  अपनी आपको एकाकार करनेकी अनुभूति की I व अनाबिल प्रेमकी I प्रकृति के संग जिबनकी I मधुभरा छंद की I व कोकिल की गुंजन भरा तान की I अभुला स्मृति की व अनुभूति की I व भावना की जो कबिता बनता ऐसे मन की गाथा नाम की I

 
मन की गाथा

मन की गाथा




मन की गाथा


टिप टिप
टिप टिप करके
सुनाई देता संगीत
झरझर झरता बारिश्की
मधु झरा महुआ निर्झरिणी !!


व गाताजाता अपनी धुन में कबिता
अपनी मनकी गाथा जो उसे ही हे पता
कभी करता कोकिल कंठ में मृदु गुंजन
तो फिर मनमे कुछ रोष भरके दिखाता
कर्कशता भीम स्वरूपी भीती अनुपमा  !!


बारिश की बुन्दे एकके बात एक दौड़ते
एक एसी स्रोत बनालेता होता भी क्श्यमता
मेरे बालक मन को वेसे भुला के लेजाता
मुझे हमेसा आकर्षित करता मनको लुभाता
बारिश में भीगने को मेरे में इच्छा होता
मेरे दिल में रहने वाला  मेरा प्रकुरुती प्रेम
अपनी आप प्रगटित होजाता मिलता नहीं पता !!


मेरा बढ़ता जाता अनुराग जानने की उत्कंठा
एकाकार होनेको उसकी साथा अपुर्ब एक इच्छा
माहोल भी अच्छा हे अबसर देता अक्सर में जानता
दुःख काहां रहता आनंदकी साथ में मौक़ा उठाता रहता !!


मेरा कोरा जो सफ़ेद कागज़ की चौठ को में तुरंत लाता
बनालेता एक नौका सारे सुखद परिकल्पना को भार देता
बहादेता वही निर्झरिणी में जो प्रेमकी भाषा सिखाता
मेरे मन की व खेलवाड़ मनोब्रुत्ति को बढाता जाता
लाता शालीनता उन्मत्तता को में अपनी आप भुलजाता  
व भी मुझे आह्वान करता बोलता बक्ष्य में चुटादे व नैया
हिल्लोलित करो मेरे तनमनको खिलादो आत्म शंतोस बाणी
तृप्त करदो सारे अंतर की उन्मादना चिरंतानी लाओ सुन्दरता
बनालो माहोल को संगीन मगर मनमे हो असरंती आत्मीयता !!




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