प्रभु शिबसंभु
जीबन में आत्मा और परमात्मा की बिच हमेसा होता निबिड़ संपर्क I जिब परम की अंश
बिशेश होनेके नाते जिब में भी रहता काफिसरे दिब्यगुण जो अपनीआप प्रगटित नहीं होता
जरुरत रहता अध्य बसायाकी I जाप तपकी और कठोर साधनाकी I जिसके लिए मानब को जानापड़ता
साधारण मानब की स्थरसे अतिमानबकी स्थितिपर I जो अमूमन होता कठिन मगर नहीं होता
असम्ब्हब उसकेलिए जब कभी करता उतना कार्य धैर्यके साथ I उसको ही मिलता परमात्माकी
कृपा I
हमेसा ये आमतोर पर दृष्टिगोचर होता की जिब आपनी प्रभुको भुल जाता उस वक्त जहां
उसकी समय और स्थितिपे पकड़ रहता I अपनी आपको सर्ब श्रेष्ठ मानके देखाताजाता
आत्मगर्ब जीस की कुछ भी नहीं होता गुण या गरिमा सिबाय मुर्खताकी बृथा आस्फालन I
किउंकि अंतराल में कोई और होता जिसका नाम हे भगबान I व हे सर्ब शक्तिमान निराकार
सर्ब ब्यापक सत्य और नित्य रुपी अखंड शक्तिकी आधार I जो समस्त संसार का चित्रकार I
जिसकी इच्छा बिना इन्हां एक भी पत्ता नहीं हिलता I ये हे बिलकुल यथार्थता I इन्हां
ये भी समझना होजाएगी भूल की मेरा कुछ नहीं हे जो करते हे हैं वही भगबान तो सारे
कार्योंके अछाबुरा केलिए व हे सबकुछ I किउंकि भगबान कभी किसीको कोई अछाबुरा कामका नहीं
कराते I जिब हमेसा अपना बिबेक शील बिचार की आधारपर अपना कर्म करताजाता जिसका
उपयुक्त केवल भगबान प्रदान करते जाते I ऐसे हर जिब की ऊपर अपना प्रभुत्व बनाया
रखते भगबान I जिब भी इसे स्वीकारता और भागबान का यशगान करताजाता I
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| प्रभु शिबसंभु |
प्रभु शिबसंभु
प्रभु शिबसंभु
गिरिजा पति
अखिल संसार
गति मुक्ति
बाएँ भागे सोहे
पारबती सती
जति भेष साजी
स्मसान निबासी
शंकर जी हो शिब जी
पाप तापसे करलो
पारी
हो भोला जी हो
बाबा जी !!
प्रभु जोगेस्वर
गणेश की पिता
स्वामी होते आप
फिर
कार्तिक के माता
संहार का कारकहो
तुम पालन करता
जगत की कारने
कार्य करता हो
तुम्ही हो अभय
दाता
मैंहूँ मुर्ख जन
अति दिन जन
भाग्यदाता हो
मोक्श्यदाता
कैसे करूं गुण गान
हो शिब जी !!
चन्द्रशेखर जी हो
शांत मूरती
सरपे खंडित शशि
शोभा मंडन्ति
तुम्ही पतिहोते
पशु जातिकी हो
बोलाजाते पशुपति
मैं हूं मंदमति
अबोध होते अति
देदो ज़रा गति
मुक्ति हो
शंकर जी !!

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