प्रकाश की ओर


प्रकाश की ओर

ये रहश्यमायी संसार में हर चीजों में रेहेस्यता भरा रहता है,दोस्तों I किसी भी चीजको आसानीसे समझा जानहिं सकता I उतनाही रहश्य जनक होता भी अपना जिबनको समझना I मन ये कतई कर नहीं पाता अनुशीलन की क्या हे कारण ये सारे रेहेस्यताका I सच तो हे की माहिर होता हे मन करनेको अनुध्यान मगर हमेसा होता नाकामियाफ़ कारण रहता बहत दूर बास्ताबिकता से I जरुर प्रभाव शाली लगता मन मगर उतना ही रहता इसमें क्ष्यन भंगुरता गुण जो उसे प्राकृत बास्तबतासे करदेता सम्पूर्ण अलग I

कहते हें ,पिंड ब्रम्हांड एक मत I बात बिलकुल सही है I संसार जिस पञ्च महाभूत से निर्मित हे पिंड भी वही पञ्च महाभूत से गठित I रेहेस्यता से केसे रहसकता दूर I समझना अति दुर्गम I कुछ समस्याएँ लाता अपनिआप  कठिनाइयां जहां मुश्किल बनता करने में समाधान I

आध्यात्मिकता की ओर......I
इसीसे भी गहेरा होता जीबन की सहश्य को समझना I ये और भी लाता कठिनाइयां जब होता दूर बास्तबिकता से I जब जीबन बनता जाता कलुषित ,मेहेसुश करता आपनी आपको दोषी तब होजाता अंत सारे अच्छाईकी राहें I जीबन में  छाजाता अज्न्यांताका अन्धकार I ऐसे में आजाता नैरासयताका बाताबरण जिसे हम आम तोरपर DEPRESSION कहते हैं I हताशा लाता दुर्बलता ,मार देता सारे आकान्क्ष्याओं को समाप्त करदेता सम्पूर्ण इछा शक्तिको तब कोई एक किंकर्तब बिमूढ़ आदमी कर्ताजाता पस्ताचाप और देनेको चाहता अपनी आपको दण्ड जो बिलकुल है असमिचिन I एसा एक स्थिति से केवल दिलासक्ता राहत केवल व ज्यान की प्रकाश I हमे जानाही होगा आध्यात्मिकता की ओर......I

प्रकाश की ओर
प्रकाश की ओर


प्रकाश की ओर

राधेश्याम बोलो भाई
बोलो सीताराम
दो पालकी हे जिंदगी
अनमोल इसकी काम !!

आत्मा राम आत्मा श्याम
अंश हे भगबान
पिंडरूपी स्थूल ब्रम्हांड में
पबनकी सामान !!

जिबपरम की निजोड़ बंधन
बिधिका हे बिधान
नामानना या फिर भूलजाना
कारण हे मरण !!

दुःख के बिना काहां जीबन
दुःख की कारण मन
क्ष्यनस्थायी ये धन जौबन
किउं हे बृथा आस्फालन
परा जीबन में इन सारोंके
नहीं हे कोई काम !!

सुख शान्ति ख़ुशी पानेकी
नाम भी काहाँ हे जीबन
शतत करलो तुम एसा कोशिस
जेसे बने कुछ बिशेस गुण !!

वहिहे आधार  मानबता का
मानबबादी हे चिंतन
बढ़ते जाओ उस प्रकाशकी ओर
आध्यात्म हे जिसकी नाम !!





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