प्यार ब्यापार नहीं होता.....

 

प्यार ब्यापार नहीं होता.....


इश्वरकी इस रहश्य्मयी श्रुस्ठी में

जिबनकी गूढ़ रेहस्यको समझके

इसे बिस्लेसन करना उतनाही कठिन

जैसे भगबान शब्दको ब्याक्ष्या करने में II

 

कितिनी बार प्रयास करचुका हूं मैं

ये समझ्नेको मुझको ही मैं 

कितिनी बार नहीं पूछा हूं आपनी को

की मैं कौन हूं ? और किस कामके मैं ?

 

कितिना संबल साथे समय गबायाहूँ

सिर्फ यही काममें लय लगाया मैं

फल लेकिन वही हातमें अब भी है निरास  

संतापित अबसादकी मारे ब्यतिब्यस्त हूं मैं II

 

चिंतन करतेहुए एकबात मगर हे मगज में

किसी अनादिकालसे कोई लगारहता किसी काम में

वह हे कोई किसीको करता प्यार गुमसुम में

फिर कोई करता जाता वही एक खुलेआम में II

 

यही एक जीबन चरित्र दिखाई पड़ता सभी में

कोई इसे बांटता जाता उदार मन में

कोई इसे संकुचित करता अपना कन्जुसिपन में

इन्हां ये प्यार का अर्थ बदलजाता ब्यापार में II

 

          सुन्दरता खोबैठता श्रीहीन लगता ब्यर्थ में

नैस्वर्गिकता उभानहोता नहीं होता प्यार में

जिबनकी अर्थ बदल जाता ब्यर्थ और बेकार में

किउंकी प्यार ब्यापार नहीं होता रहता भावना में II






 

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