गुलाब की बिलाप

 

गुलाबकी बिलाप

गुलाब की बिलाप
गुलाब की बिलाप 
 

पता नहीं कैसे आज

भोर सबेरेसे मेरा नींद उडगेया

मनही मन सोचनेलगा

और कबतक ऐसे बिस्तर पर मै

अजगरकी तरह करबत बदलतारहूँ

चलो चलें अब सबेरेसे ज़रा मुलाक़ात करलूं II

 

तनमन में नयी उल्लास भरगेया

घरकी अन्दर अब और मुझे रहा नहीं गया

दरवाजा खोलके मैं सड़कपर आया

सड़क काफी शांत और निस्तब्ध था

मैं एसेही आगे जारहाथा कोई ठोस लक्ष्य भी नाथा II

 

जातेजाते कुछही दुरीपर मैं आमिला

शान्तिबन में जो एक था पुष्प उद्यान

अबसर बिनोदन केलिए उद्दिस्ट बेहेलाता मन

मैं एसेही घुसगया पता नहीं  केसे लगामन

लगाता गया चक्कर धीरेधीरे पांव कर संचालन

वेसेतो वाहां काफिसारे फूल खिलखिला रहते थे

सायद मुझे देखकर बोलरहाथा मेरा मन

मैंभी प्रतिक्रिया स्वरुप देरहाथा मंद मुस्कान

काफी कौतुहल पुर्नथा मेरा मन

पर एकदमसा बदलगया माहोल और ध्यान

जब मेरा आँख किया व गुलाबको अबलोकन II

 

आचंबित मैं स्थम्भिभुतहुआ दृश्य देखकर

उतना चित्ताकर्षक परिबेश फिरभी वथा परिसान

मै जाननेको चाहां क्याथा असली कारण

व रोपडा और बखानने लगी कोह जोथा मन

वाकई उसकी बात था सम्बेदंशील असाधारण

व काफी निरासथा बातथा जीबन मरण

बिलाप कररही थी  समझके बेकार होगेया जीबन

जिस कामकेलिए मुझे बनायाथा मेरा भगबान

कुछभी नाआया काम मैं भ्रमरसे भी हूं अंजान

ख़तम होगेया जोथा सारे गर्ब एहेंकार मेरे मन

मौतभी निकट हे सायद एक या दो क्षण

ये मेरी ग्लानी की कारण जो है मेरा मन II

 

सुनके ये मैंभी ज़रा सम्बेदंशील बन गया 

उसे आश्वासन देनेके लावा मेरे पास थाभी क्या?

 मैं बोला मतरो गुलाब रानी ये जगत ही माया

इन्हां करतब की बल पर हरकोई उत्तम कहलाया

चलतेजाना जबतक प्राण है अन्दर काया II

 

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