महत है जीबन
महत हे जीबन
मैं एक बालक
मैं एक शिशु
महज बारह शाल
पबित्रताका हूं मैं मूरत
सुधपूत तनमन II
सोच में कहो या फिर कथन
सबकुछ सुद्ध ही सुद्ध अमूमन
मगर उमर जब बढ़ता जाता
चढ़जाता कुत्रिमता का आभरण
II
इसे स्वाभाबिक बोलके कहना
कुछ नहीं कलुषितताको अपनाना
दायित्वबोधसे हठ्के रहना
ये सारे होते व रहस्यमयी
उपादान II
कलुषत परिबेश्का असर पड़ता
शिशुका कोमल हृद इसे ग्रहण
करता
जिसे व निष्पाप शिशु सच
समझके
अपना चरित्रका अबिछेद्य अंश
बनालेता II
बनताजाता चरित्र हिन् दिनवा
दिन
अज्न्यातमें करता चरित्र
हनन
उस हद तक जहां कुछ नहीं
रहता
उसमें इनसानियातका नाम और
निसान II
दोस्तों बड़ा दुखदायी ये बात
अमूमन
एक अमृत संतानका जेहरमें
परिबर्तन
बास्ताब में काम बड़ा चिंतन
और मनन
देनाहोगा ध्यान कारण महत है
जीबन II

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