आबेदन

 

आबेदन


 

आबेदन

आबेदन

पता नहीं क्यूँ एसा होता

मेरा दिनवा दिन बढ़ता जाता

गुलाबके साथ अंतरंगता

मैं आकर्षित होताजाता अतर्कित

एक निजोड बंधन बंधता जाता II

 

जब मैं काल उसे देखा

एक कलिका थी इंगित कररही थी

बोल रहीथी व अपनीही बारेमे

आबेदन था कुछ करनेको उसकी साथ II

 

मुझे ये पताथा कुछ  क्षणमें हि

प्रगटित होगा उसकी नैसर्गिक गुण

सुन्दरता और सौरभताका संभार

पबनमें दोदुल्यमान नर्तकिकी ठानी

जिसे बयान करना असमर्थ हे बाणी II

 

उसकी चेहेरेपे रौनक था ही

नुर की कोई पटांतर नहीं हंसती थी

मगर सामकी अंतिम क्षण जब में

गया उसकी पास व बोलनेलगी क्षीण में

क्या आप नहीं कराएंगे मेरे जीबन को सार्थक ?

तुम्हारेबिना में भला केसे लगूं बिभू पदारबिंद

 शांत  करूं तनमन को सार्थक करूं जीबन II

 

गुलाबकी ये प्रश्न मुझे भाबुक बनाडाला

इसके बिना फिर परिबेश का होगा क्या ?

बदल जाएगा पुरा माहोल मैं केसे करूं बयां II

 

जरुर अस्थिर हुआ मन ये करके चिंतन

मनमें बार बार उठरहीथी उलझन

क्या में करूं सहायता अनुरूप उसकी मन

धरमका नैया क्या में जाऊं बन जो कहे मन

बन जाऊं कारण उसकी व करलें सार्थक जीबन II

 

 

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