डरकी पीछे जित है .....
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डरकी पीछे जित है .... |
आज नहीं
ऐसे कबसे मैं
याद करके कहूँ तो
सायद ही बचपन से
ये सोच बनाताजाता डरपोक
ये मतकरो घरवाले बुरा
सोचेंगे
व मतकरो रिश्तेदार खफा
होजाएगें II
ऐसे में अपनीको चपातेहुए
आखिर कबतक ठहर पाएंगे
जरूरतो आत्मा संजत बना हूँ
बदलेमें आत्ममुक्ति खोचुका
हूँ
जहां मैं अब मैं ही नहीं
रहा हूँ
किसीकी हाथकी कठपुतुली
बनाहूँ
सिर्फये डर मैं और कबतक
स्विकरलूं ?
मैं बेबस बनगया हूँ अब
मुक्त सांस मुझे स्वप्न
बनचुका है
ऐसे घूंटघूंटके जिंदगी कबतक
काटूँ
यहीएक सोच मुझे हरवक्त
क्याकरूँ ?
अंतर आत्मा कईबार कहरहा है
खंड बिखंडन करनेको मन कहता
है
सारे व बाधाएं जोमुझे बंदिस
बनाता है
बारबार हिम्मत जुटानेको
ललकारता है
अपनीही स्वर में बोलता डरकी
पीछे जित है II
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