कर्मकी बलपर
एक ही शब्द
व है केवल दुःख
कितिनों को सदियों से
परिसान करके रखा है
इसकी है नहीं कोई कलना
चाहे कहें जैन या बुद्ध
फिर कहें जिसु या मुहम्मद
सभीने ब्यास थे लाने में
सुलझन
कैसे सुलझेगा दुःख की उलझन
II
आज भी चलता रोज
दुःख बिनाशका खोज
मगर अबसोस वहिभी आज
उन्न्मोचित नहीं हुआ है
इसकी राज II
छुटता कई प्रकारकी आवाज
इन्हां मिलेगी शान्ति करो
कामकाज
कोई कहते करलो बिभुकी भज
कोई करते रहते भी ज्यानकी
खोज
फिरभी पहले जैसी वही राज II
ईसी एक बातमें इसे क्यूँ
उलझना यारों
समझलो एकही सरल फंडा
आज
अपनी आपको कर्मयोगी बनालो
जो सहज
करमकी बलपर ही रुन्धलो
दुखकी आवाज II

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