अद्भुत प्रेम

 

अद्भुत प्रेम

अद्भुत प्रेम

जिस दिन से तुम चले गए

 फिर कभी नहीं लौटा

 काश एक बार आकर देख लेते

 शायद समझ जाते मेरे मन के दर्द 

 लेकिन मैं इसके लिए आपको भी

 दोष नहीं दूंगा, किउंकि मुझे मालूम है,

 आप क्या,यहाँ कौन देख रहा है?

 मेरे जैसे धनहीन दिलको अंदरतो है,

 ढेर सारे अतृप्त भूख।



 प्रेम बिना क्या जीना?

 आज होगेया हे गलत साब्यस्त,

 मेरा अध्ययन करता ये सिद्ध,

 प्रेम बिना आसान यहां,अगर

 मिलता है, कुछ धन,मान, सम्मान

 दिखानेको,गौरब,गरिमा बस,

 यही एक करता प्रेमको अब्यस्थित,

 बेचारे दिलकी हराम करदेता जीना?



 मुझे लगता,यह थोड़ा अजीब है,

 दुःख है मुझे यह जानकर,

 यहां प्यार के बिना जीना आसान है,

जब भाबता हूं मनं में प्रश्न उठता,

 क्या सचमुछ, पेट भरता प्रेम में?

 क्या है सारे इच्छाओं को

 चरितार्थ करनेका जरुरी ताकत,

 निरासा बोध होता,उत्तर देनेको?



 इंहां स्वतः एक प्रश्न उठता मनमे

 क्या प्यार में सचमुछ कुछ है?

 लगारहा इसे खोजने की कोशिश में,

 अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचे हुए दुःख में,

 यह हमारे संज्ञान में आया अजीब है,

 प्यार के बिना यहां सब कुछ मिलता,

 यही खरीदारी की दुनिया में,

 कुछ सामान्य धनकी बदले में,

 प्यार तो बस नाम में रहजाता,

 अपना मूल अस्तित्व खो देते हैं,

 बदनाम हो जाता, बेकार,

 जो दिव्य, परिपूर्ण,शाश्वत स्वरूप में।


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