मैं सपना देखता हूँ
मैं सपना देखता हूँ
वाह कैसा सुंदर सबेरा!
मैं एक सपना देखता हूं,
समय बिल्कुल अनुकूल
में अभी ही बिस्तर छोड़ा हूं
अति नरम बेला, मैं हूं अकेला
ठीक मेरे घरकी सामने व है
उसकी साथ मेरा नजर मिला,
व एक पलके लिए ही था निश्चित,
मगर मौन में बहुत कुछ कहगया।
रूपरंग में बिल्कुल सुंदर
लाल होठं पे हंसी मंद मंद
चाँद जैसी मुखड़ा मनोहर
शरीर से उठता गंध मकरंद
चंचल दुष्टपबन करता अथय
भावना लाता अनेक सर पर
मेरे में पैदा करता कूछ प्रश्न
कियूं व आंख मिलाया मुझ से
फिर कियूं निरब होगेया खुद से
कुछतो तो बोल रहीथी आंखड़से
जिसे मैं पढरहाथा भावराज्य पर।
उसकी स्थूलरूप मेरेमें होता बिम्बित
मैं अथय नहीं होता भावबीहवालित
वहीं समझनेको करता कोशिस समस्त
कभी होता आचंबित प्यार क्या होगेया?
करता पान आकर्षणको जो लगता मस्त,
भूलने लगता अपनिको औऱ बाकी समस्त
बिल्कुल नहीं हूं परिसानीमें एकदम सुस्त।
मनमें आज ऐसा प्रश्न स्वतः कहींसे आजाता
प्यार और लगाव में क्याकुछ अंतर रहता
उत्तर हमेसा प्रकृतिमें नाहोता भावनामें रहता
आकर्षण प्यारका बास्तबता,असली गुण होता
इसे छोड़के प्रेमको समझा जा नहीं सकता।
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