मुझे ऐसा लगता है

 

मुझे ऐसा लगता है

मुझे ऐसा लगता है



तुम्हारी व बात,

जो कोसिस करते हुए भी

तुम कह नहीं पाये,

जो रह गयीई

दो बातों के दरम्यां

सटक कर अटक गया

तुम्हारे लाल अधरों पर

जिसे छुपा लिया

चतुर छल माहिर

तुम्हारी नजरों ने

पलकें झुका कर,

समझ गयाहूं दिल पर

उसे पढ़ लिया हूं मैंने 

और वह शामिल हो गया है

मेरे सीने में मेरे होने में ।


तुम को मैं लिखता हूँ आजकल,

अपनी कविताओं में

सजाता हूं शब्दकी पंक्ति में

बूँद बूँद

अपने वजूद में डूबोकर

तुम्हारे लिए बेसक

जो थी तुम्हारेलिए कष्टकर

एक ज़रा

अनकही सी बात,

वह अब एक सिलसिला बन गया है

एक प्रेमकी नदी बनके बहरहा है

ये कभी नहीं खत्म होने वाला।


मेरे मन का आकाश

अब खोज रहा है प्रकाश

अभी भी ताकता है राह

और फाहे से बनाता है

तरह तरह की तस्वीरें मन भर

और फिर फूंक कर उड़ा देता है

इधर उधर जो होजाता बेकार

मुस्कुराते हुए सपनोंकी भाबराजय पर,

कभी कभी बरस भी जाता है

आँखों से, निकलता है लहू बनकर,

अगर कभी इधर आना अपना समझ कर

तो लेकर जरूर आना

एक नाव।


नदी जो तुम्हें दिखती है सूखी

बास्तब मैं व है दुःखी

दरअसल लबालब भरी हुई

जिस किनारे पर कभी तुमने लिखा था

अपना नाम,प्रेमकी पैगाम

उसे मैंने अब भी बचाकर रखा है

उस नदी की बहकती धारा से

अपनी देह की आड़ देकर

और तुम्हारी अँगुलियों की छुअन

महसूस करता हूँ अब भी मैं

अपनी ही हथेली पर

जब आओ तो अपने पैरों के नीचे

रख लेना सुन्दरसा सुगंधित 

एक फूल।

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