शिकायत

शिकायत

शिकायत



मैं प्रेम हूं

भाबुक हूं कबि हूं

मेरे हृदयकी भावनाओंको

प्रेम कविता में प्रेम बरसाता हूँ 

तुमको ही लिखता हूं सपनेमें सजाता हूं

बिना तुम्हारा नाम लिए लिखते जाता हूँ

छुपा देता हूँ शब्दों के बीच कहीं रख देता हूँ 

तुम्हारा कहा कोई शब्द इधर उधर होके

भले ही शिल्प बिगड़ता हो अबबोध लगता हो

पर उस कविता से भीनी ख़ुशबू आती है।


उपमा की कोई कमी है नहीं

जैसे तुम्हारी दी हुई मोरपंखी 

खोल ली हो रात-बिरात 

तुम्हें मैं छुपाकर रखता हूँ शब्द में 

जब धूप होती है भूल कर

बारिश लिख देता हूँ कियूंकि

तुम्हें मैं भीगते हुए देखता रहता हूँ 

कविता के भीतर ही कभी

पहली पंक्ति में बैठकी है तुम्हारी 

जबकि मैं कहीं अंतिम पूर्णविराम के पास 

टँगा हुआ टुकुर-टुकुर ताकता रहता हूँ।


मैं रचनाकार मेरे भाबराजय का

मैं रचलेता हूँ एक अलगसा दुनिया 

जिसमें मैं हूँ और साथ में तुम भी 

एक पिंजरा है खूब सूरत सी 

साथ निभाने की हज़ार बहाने  

दूर जाने का एक भी नहीं 

कभी विमुखता आजाता मन में

ज़िंदगी से शिकायत करता हूं

ख़ुद से बहुत ज़्यादा और थोड़ी बहुत

 दुनिया से भी कपाट बंद कर लेता हूँ।


ब्याथित बाहर खड़े रह जाते हैं 

और मैं इस पार उतर आता हूँ कविता में 

यह इतबार भी तुम्हारे साथ बीता

मैं बनगया प्रेम और तुम बनगए कविता।



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