एहसास प्रेम की


एहसास प्रेम की

एहसास प्रेम की


जिसदिन तुम जीबन को समझने लगोगे

इसकी सुंदरता को तुम भाबुक बन कर

समय के पन्नों पर जब तुम प्रीत लिखोगे

मधुर-मधुर सुंदर-सुंदर फिर गीत लिखोगे।


यादों के आँगन में ख़ुद को खोने देना

कल्पना बास्तब बन जाए तो होने देना

आँखें यदि रोतीं हैं तो फिर रोने देना

प्रकृति को जिस दिन तुम प्यार करोगे

उसदिन नया एक जिबन का उत्थान होगा 

चेतनता क्या जड़ को भी स्वीकार करोगे

निर्मल, निश्छल, कोमल भावों की बगिया के

पत्ते- पत्ते पर उस दिन तुम प्रीत लिखोगे

जिबनकी हरपल को नैसर्गिक बना डालोगे।


समय की हरपल तुम झंकार सुनोगे

झरनों की मीठी-मीठी जब तान सुनोगे

नदियों की चंचल लहरों का गान सुनोगे

नचा रहा है कोई जब तुम ये जानोगे

ताल ताल पर नाचोगे उसको मानोगे

झूम उठोगे जिस दिन अपनी ही मस्ती में

उसदिन तुम जीबन को जीने लगोगे

 वहीं शुचितम जीवन का संगीत लिखोगे


जीबन सुंदर सास्वत हर दुःख से परे है

झूठ-कपट से जिस दिन तुम नाता तोड़ोगे

सच्चाई से जिस दिन तुम ख़ुद को जोड़ोगे

हाहाकार मचेगा जिस दिन मन के भीतर

 उमड़ उमड़ कर आएगा फिर पूरा सागर

उसकी सत्ता का अहसास तुम्हें जब होगा

माटी से तन पर प्रीतम की जीत  लिखोगे

प्रेम से परमात्मा का पूजन तब करने लगोगे।

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