अधूरी यादों का शहर — एक गांव की लड़की की प्रेम कविता
अधूरी यादों का शहर — एक गांव की लड़की की प्रेम कविता 🌙
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| अधूरी यादों का शहर |
शहर की इस भीड़ में,
ऊंची-ऊंची इमारतों के बीच,
मैं अक्सर खुद को ढूंढती हूँ…
किसी खोई हुई आवाज़ में,
किसी पुराने गीत की धुन में,
या खिड़की से दिखते आसमान के छोटे से टुकड़े में।
शादी के बाद इस शहर में आई हूँ,
सब कहते हैं —
“तुम खुशकिस्मत हो,
अब तुम्हारा घर बड़ा है,
जिंदगी आसान है।”
पर क्या कोई जानता है,
कि मेरे दिल के कोने में
अब भी एक छोटा सा गांव बसता है?
जहाँ कच्ची गलियाँ थीं,
जहाँ धूल उड़ती थी,
जहाँ हर शाम सूरज
सरसों के खेतों में सो जाता था।
और वहीं…
मेरी पहली मोहब्बत भी रहती थी।
वो बचपन का दोस्त,
जिसके साथ मैंने
नदी किनारे कंकड़ उछाले थे,
जिसके साथ आम के पेड़ पर चढ़कर
चोरी से कच्चे आम तोड़े थे।
जिसकी हँसी में
पूरा आसमान गूंजता था।
मुझे याद है वो पहली बारिश,
जब हम दोनों भीगते हुए
खेतों के बीच दौड़े थे।
मेरी चूड़ियाँ खनक रही थीं,
और वो हंसकर बोला था —
“तुम्हारी हँसी बारिश से भी ज्यादा सुंदर है।”
उस दिन मैंने पहली बार महसूस किया था,
कि दिल का धड़कना
किसी और के लिए भी हो सकता है।
गांव की वो सुबहें,
जब कोयल की आवाज़
अलार्म घड़ी बन जाती थी।
और मैं छुप-छुप कर
उसके घर के सामने से गुजरती थी,
बस एक झलक पाने के लिए।
हमने कभी “आई लव यू” नहीं कहा,
ना ही कोई बड़ी कसमें खाईं।
बस आँखों की भाषा थी,
और चुप्पियों में छुपा इकरार।
एक दिन मेले में
उसने मुझे लाल चूड़ियाँ दी थीं,
और धीरे से कहा था —
“जब भी इन्हें देखना,
मुझे याद करना।”
मैंने मुस्कुराकर सिर झुका लिया था,
क्योंकि शब्द उस वक्त
बहुत छोटे लग रहे थे।
गांव का वो पीपल का पेड़,
जहाँ हम घंटों बैठे रहते थे,
बिना कुछ कहे।
हवा चलती थी,
और पत्तों की सरसराहट
हमारे दिलों की बातें सुनती थी।
शाम को जब गौएँ लौटती थीं,
और धूल के बादल उठते थे,
वो मेरी तरफ देखता था,
और मैं नजरें झुका लेती थी।
जैसे पूरा संसार
सिर्फ उस एक पल में सिमट गया हो।
फिर एक दिन
घर वालों ने मेरी शादी तय कर दी।
सब कुछ बहुत जल्दी हुआ।
मेहंदी, संगीत, विदाई…
सब जैसे किसी सपने की तरह गुजर गया।
मैंने उससे कुछ नहीं कहा,
वो भी चुप रहा।
बस आखिरी बार
गांव की बस स्टैंड पर
हमारी नजरें मिली थीं।
उसकी आँखों में सवाल था,
मेरी आँखों में जवाब…
पर शब्द कहीं खो गए थे।
बस चली गई,
और मेरे पीछे
एक पूरा अध्याय छूट गया।
आज इस शहर में,
जब रात बहुत लंबी हो जाती है,
और नींद आंखों से रूठ जाती है,
तो मैं वही पुरानी यादें खोल लेती हूँ।
यहाँ की सड़कों पर
न कोई मुझे नाम से बुलाता है,
न कोई बिना वजह हंसता है।
सब जल्दी में हैं,
सब अपने-अपने सपनों में खोए हैं।
पर मेरे सपनों में
अब भी वो गांव आता है।
सरसों के पीले फूल,
नदी का ठंडा पानी,
और वो लड़का…
जो शायद अब किसी और का हो चुका होगा।
क्या वो भी कभी
मुझे याद करता होगा?
क्या उसे भी वो बारिश याद है?
क्या उसने भी
लाल चूड़ियाँ संभाल कर रखी होंगी?
मैं नहीं जानती।
पर इतना जरूर जानती हूँ —
पहला प्यार कभी खत्म नहीं होता,
वो बस
यादों के रूप में बदल जाता है।
कभी-कभी मैं बालकनी में खड़ी होकर
आसमान देखती हूँ,
और सोचती हूँ —
क्या वही आसमान
मेरे गांव के ऊपर भी फैला है?
शायद वो भी
किसी रात उसी चाँद को देखता होगा,
और चुपचाप मुस्कुरा देता होगा।
मेरी जिंदगी अब बदल चुकी है,
जिम्मेदारियां हैं,
नए रिश्ते हैं।
पर दिल का एक हिस्सा
अब भी उस गांव में अटका है।
मैं अपने पति से प्यार करती हूँ,
अपने नए घर को अपनाया है।
पर दिल के पुराने कमरे में
एक तस्वीर अब भी टंगी है।
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| अधूरी यादों का शहर |
वो तस्वीर
न कोई गुनाह है,
न कोई धोखा।
बस एक मासूम याद है,
जो मुझे याद दिलाती है
कि मैंने कभी
सच्चे दिल से किसी को चाहा था।
और शायद
वो भी मुझे चाहता था।
शहर की रातें लंबी हैं,
पर यादों का गांव
अब भी मेरे अंदर जिंदा है।
जब भी हवा में मिट्टी की खुशबू आती है,
मैं आँखें बंद कर लेती हूँ…
और फिर से वही लड़की बन जाती हूँ —
जिसके हाथ में लाल चूड़ियाँ थीं,
और दिल में पहला प्यार।


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