तुम्हें ढूँढती हुई मैं

 शीर्षक: तुम्हें ढूँढती हुई मैं

तुम्हें ढूँढती हुई मैं

रात की चादर पर चाँद ने

अपनी उजली स्याही से एक नाम लिखा,

और हवा ने धीरे-धीरे मेरे कानों में कहा—

**“वो कहीं पास ही है… बस तुम ढूँढती रहो।”**


मैं वही लड़की हूँ,

जिसकी आँखों में सपनों की नदी बहती है,

जिसके होंठों पर मुस्कान का उजाला है,

और दिल में एक अधूरी कहानी…

एक ऐसा प्रेम, जो खो गया—

और फिर भी हर धड़कन में ज़िंदा है।


तुम चले गए थे एक दिन,

बिना अलविदा कहे,

बिना कोई आख़िरी वादा छोड़े,

बस मेरी हथेली पर

अपनी उँगलियों की गर्माहट छोड़कर…

और मेरे भीतर

एक लंबी तलाश छोड़कर।


अब मैं शहर की गलियों में

तुम्हारी परछाईं ढूँढती हूँ,

हर मोड़ पर, हर चौक पर,

हर भीड़ में, हर ख़ामोशी में,

मैं तुम्हें खोजती हूँ…

जैसे बारिश में कोई

अपना खोया हुआ आसमान खोजे।


कभी लगता है

तुम किसी चाय की दुकान पर बैठे हो,

जहाँ अदरक की खुशबू

तुम्हारी हँसी के साथ मिल जाती थी।

मैं वहाँ जाती हूँ,

कप को दोनों हथेलियों में थामकर

उस गर्माहट को महसूस करती हूँ,

और सोचती हूँ—

**“यही तो था तुम्हारा तरीका…

मेरे ठंडे दिनों को गर्म कर देने का।”**


लेकिन वहाँ

सिर्फ़ भीड़ होती है,

कुछ अनजान चेहरे,

और एक खाली कुर्सी…

जो हर बार

मुझे तुम्हारी याद दिलाकर

और ज़्यादा खाली कर देती है।


मैं नदी किनारे भी गई,

जहाँ हमने पहली बार

अपने नाम के साथ

एक-दूसरे का सपना जोड़ा था।

तुमने कहा था—

“अगर कभी मैं खो जाऊँ,

तो इस पानी में मेरी आवाज़ ढूँढना,

क्योंकि मैं तुम्हारे नाम को

हर लहर में पुकारूँगा।”


मैंने नदी से पूछा—

**“क्या तुमने उसे देखा?”**

नदी ने सिर्फ़ इतना कहा—

“मैंने बहुतों को बहते देखा है,

कुछ यादें बनकर,

कुछ आँसू बनकर,

और कुछ लोग…

कभी लौटकर नहीं आते।”


मैं डर गई।

मैंने अपने आँसू

नदी में नहीं गिरने दिए,

क्योंकि मुझे डर था

कि कहीं मेरे आँसू

तुम्हारे रास्ते को धुंधला न कर दें।

तुम्हें ढूँढती हुई मैं

मैं स्टेशन पहुँची—

जहाँ हम साथ खड़े होकर

ट्रेन की आवाज़ में

अपने दिलों की धड़कन सुनते थे।

मैंने प्लेटफॉर्म की ठंडी बेंच पर बैठकर

अपने दुपट्टे को कसकर लपेट लिया,

जैसे यह दुपट्टा नहीं

तुम्हारी बाँहें हों।


ट्रेन आई…

लोग उतरे…

लोग चढ़े…

घोषणा हुई…

सीटी बजी…

और फिर ट्रेन चली गई।


लेकिन तुम नहीं आए।


फिर भी मैं रुकी रही,

क्योंकि प्रेम में

रुकना भी एक उम्मीद है।

और उम्मीद…

मेरे दिल का सबसे खूबसूरत ज़ख्म।


मैंने उन रास्तों पर भी कदम रखे

जहाँ तुम्हारे साथ

मेरी हँसी गिरी थी,

जहाँ तुम्हारे कंधे पर

मेरा सिर टिका था,

जहाँ तुमने मेरे बालों से

एक छोटा सा पत्ता हटाया था

और कहा था—

“तुम्हारे बालों में भी

मौसम ठहर जाता है।”


अब वही रास्ते

मुझे देखकर चुप हो जाते हैं,

और पेड़

अपने पत्ते गिराकर

मेरे पैरों में

कुछ कहने की कोशिश करते हैं।


मैं हर पत्ते को उठाती हूँ,

जैसे उसमें

तुम्हारा कोई संदेश छुपा हो।

लेकिन उसमें सिर्फ़

सूखे रंग होते हैं…

और मेरा मन

तुम्हारी कमी से

और भी गीला हो जाता है।


मैंने मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर

भगवान से नहीं,

अपने प्रेम से प्रार्थना की।

मैंने कहा—

“अगर तुम कहीं हो,

तो मुझे संकेत देना।

एक छोटी सी हवा,

एक हल्की सी रोशनी,

एक साधारण सा सपना…

बस इतना ही।”


और उसी पल

घंटी बजी।

ऐसा लगा

जैसे किसी ने मेरे भीतर

तुम्हारा नाम बजा दिया हो।


मैं उठी,

भीड़ को चीरती हुई

मैंने चारों तरफ़ देखा।

लेकिन वहाँ

तुम नहीं थे।


फिर भी

उस घंटे की आवाज़

मेरे दिल में

तुम्हारे कदमों जैसी लगी।


मैं घर लौटी,

और अपने कमरे की दीवारों को

तुम्हारी यादों से भरने लगी।

तुम्हारी पुरानी तस्वीर,

तुम्हारे लिखे हुए दो शब्द,

एक सूखा गुलाब,

और वो कागज़

जिस पर तुमने लिखा था—

**“मैं हमेशा लौटूँगा।”**


मैंने उस कागज़ को

कितनी बार पढ़ा होगा,

गिनती नहीं।

क्योंकि प्रेम में

गिनती नहीं होती,

सिर्फ़ इंतज़ार होता है।


रात को

मैंने खिड़की खोली,

तारों से पूछा—

**“क्या तुमने उसे देखा?”**

तारों ने झिलमिलाकर कहा—

“हम तो रोज़ देखते हैं

बहुत सी कहानियाँ,

कुछ पूरी होती हैं,

कुछ अधूरी रहती हैं…

लेकिन जो सच्चा प्रेम होता है,

वो रास्ता खुद बना लेता है।”


मैंने आसमान को देखा,

और लगा

तुम भी कहीं

इसी आसमान को देख रहे हो।

शायद उसी चाँद के नीचे,

शायद उसी हवा में,

शायद मेरी ही तरह

किसी मोड़ पर

मुझे खोजते हुए।


तभी मेरे फोन की स्क्रीन जली।

एक अनजान नंबर।

मेरी साँस रुक गई।


मैंने काँपते हाथों से

कॉल उठाई।

उधर से

सिर्फ़ शोर था,

जैसे किसी भीड़ में

किसी ने मेरा नाम पुकारा हो।


फिर एक आवाज़ आई—

हल्की, टूटी हुई,

पर मेरी रूह को पहचानने वाली।


**“तुम… अभी भी…

मुझे ढूँढ रही हो?”**


मैंने कहा—

“हाँ…

मैं हर दिन ढूँढ रही हूँ।

हर साँस में ढूँढ रही हूँ।

हर धड़कन में ढूँढ रही हूँ।”


वो आवाज़ रो पड़ी।

और फिर

कॉल कट गई।


मैं वहीं बैठी रह गई।

मेरी आँखों में

आँसू नहीं,

आग थी।

एक ऐसी आग

जो प्रेम से जलती है,

और उम्मीद से चमकती है।


मैंने अपने पैरों में चप्पल पहनी,

दुपट्टा ठीक किया,

और बाहर निकल पड़ी।

रात थी,

लेकिन मेरे भीतर

सूरज उग चुका था।

तुम्हें ढूँढती हुई मैं

मैंने सड़क से पूछा—

“वो कहाँ है?”

सड़क ने कहा—

“जहाँ तुम्हारी नज़र सबसे पहले जाएगी।”


मैं दौड़ती रही।

हर मोड़ पर

दिल की धड़कन तेज़ होती गई।

हर कदम के साथ

मुझे लगता

मैं तुम्हारे पास पहुँच रही हूँ।


फिर मैं उसी जगह पहुँची—

जहाँ हमने आख़िरी बार

एक-दूसरे को देखा था।


वहाँ वही पुराना पेड़ था,

वही पुरानी बेंच,

वही हवा,

और वही रात।


बस एक चीज़ नई थी—

मेरे सामने

एक परछाईं खड़ी थी।


मैंने धीरे-धीरे कदम बढ़ाए।

मेरी आँखों ने

पहले तुम्हारे जूते पहचाने,

फिर तुम्हारी चाल,

फिर तुम्हारे हाथों की कंपन,

और फिर…

तुम्हारी आँखें।


वही आँखें

जिनमें मेरा घर था।


तुमने कहा—

“मैं बहुत दूर चला गया था…

पर हर रास्ता

तुम्हारे पास ही लौटता रहा।”


मैंने कहा—

“तुमने मुझे अकेला छोड़ दिया था।”


तुमने कहा—

“नहीं…

मैंने तुम्हें अपने भीतर रखा था।

बस हालातों ने

मुझे तुम्हारे सामने आने नहीं दिया।”


मैंने तुम्हारे चेहरे को छुआ।

जैसे यकीन कर रही हूँ

कि यह सपना नहीं।


तुमने मेरी हथेली थामी,

और कहा—

“मैं लौट आया हूँ।”


मैं रोई नहीं।

क्योंकि कुछ मुलाकातें

आँसुओं से नहीं,

खामोशी से पूरी होती हैं।


मैंने बस इतना कहा—

“अब कहीं मत जाना।”


तुमने मुस्कुराकर कहा—

“अब अगर जाऊँगा भी,

तो तुम्हें साथ लेकर।”


और उस रात

चाँद ने फिर

आसमान पर एक नाम लिखा—

लेकिन इस बार

अधूरा नहीं,

पूरा।


मेरे नाम के साथ

तुम्हारा नाम।


हवा ने मेरे कानों में कहा—

**“देखा…

सच्चा प्रेम

कभी खोता नहीं,

बस कुछ देर

रास्तों में रुक जाता है।”**

तुम्हें ढूँढती हुई मैं

मैंने तुम्हारे कंधे पर सिर रखा,

और अपनी आँखें बंद कर लीं।

अब मुझे ढूँढना नहीं था।

अब मुझे बस

जीना था।


तुम्हारे साथ।



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