दो शहर, एक दिल
**शीर्षक: दो शहर, एक दिल**
दो शहर हैं हमारे बीच,
पर दिल एक ही धड़कता है,
एक तेरे सीने में बसा है,
एक मुझमें हर पल सिसकता है।
तू उस शहर की सुबह है,
मैं इस शहर की रात,
पर एक ही आसमान के नीचे,
हम दोनों की एक ही बात।
तेरे शहर में जब सूरज उगता है,
मेरे शहर में चाँद ढलता है,
वक़्त जैसे हमसे खेलता है,
पर दिल तुझसे ही मिलता है।
दूरी की ये लकीरें लंबी हैं,
पर मोहब्बत की डोर मज़बूत,
हर रोज़ तेरी यादों से,
दिल करता है खुद से ही सूरत।
तेरे शहर की गलियों में शायद,
कोई मेरी खुशबू रहती हो,
मेरे शहर की हवाओं में,
तेरी कोई बात बहती हो।
हम दो शहरों में रहते हैं,
पर ख्वाब एक ही देखते हैं,
तेरी आँखों में जो सपना है,
वो मेरी पलकों पे भी सजते हैं।
कभी सोचता हूँ यूँ ही,
अगर ये फासले मिट जाएं,
तेरे शहर की हर राह से,
मेरे कदम भी जुड़ जाएं।
फोन की स्क्रीन पे जब तू हँसती है,
तो दिल को सुकून मिल जाता है,
जैसे दो शहरों के बीच,
एक पुल अचानक बन जाता है।
तेरी आवाज़ में वो जादू है,
जो हर दूरी को छोटा कर दे,
तेरी एक “कैसे हो” में,
हर ग़म को हल्का कर दे।
मैं इस शहर की भीड़ में खोया,
तू उस शहर की रौनक में गुम,
पर दोनों की तन्हाई में,
बस एक-दूजे का ही है गुम।
तू वहाँ बारिश में भीगती होगी,
मैं यहाँ खिड़की से देखता हूँ,
हर एक बूंद में तेरा नाम,
चुपके से मैं ही लिखता हूँ।
तेरे शहर की शामें रंगीन,
मेरे शहर की रातें खामोश,
पर दिल की हर धड़कन में,
तेरा ही नाम है बेहोश।
हम मिलते हैं हर रात सपनों में,
जहाँ कोई दूरी नहीं होती,
जहाँ दो शहर नहीं होते,
बस एक ही दुनिया होती।
वो दुनिया जहाँ तू पास होती है,
और मैं तेरा हाथ थामता हूँ,
जहाँ हर लम्हा रुक जाता है,
और मैं तुझे बस निहारता हूँ।
पर सुबह होते ही फिर से,
दो शहर सामने आ जाते हैं,
और हम दोनों फिर से,
अपने-अपने रास्तों में खो जाते हैं।
कभी तेरे शहर आ जाऊँ,
ये ख्वाहिश दिल में रहती है,
तेरे हर रास्ते को छू लूँ,
ये चाहत हर पल कहती है।
तेरे शहर की चाय में,
शायद मेरा स्वाद मिल जाए,
तेरे हर दिन की कहानी में,
मेरा भी कोई किरदार मिल जाए।
मैं अपने शहर की सड़कों पर,
तेरे नाम के कदम रखता हूँ,
हर मोड़ पे तुझे याद करके,
खुद से ही बातें करता हूँ।
दो शहरों की ये दूरी,
अब कहानी बनती जा रही है,
हर दिन, हर लम्हा,
मोहब्बत गहरी होती जा रही है।
तेरी तस्वीर मेरे कमरे में,
जैसे एक खिड़की बन गई है,
जिससे तेरे शहर की झलक,
मेरी दुनिया में आ गई है।
मैंने अपने शहर के आसमान से,
तेरे शहर का पता पूछा है,
हर तारे से तेरे बारे में,
चुपके से जिक्र किया है।
तू भी शायद कभी,
मेरे शहर को सोचती होगी,
मेरी गलियों की धूल में,
अपनी यादें खोजती होगी।
हम दोनों के बीच जो फासला है,
वो बस नक्शे पर दिखता है,
दिल के रास्तों में तो,
हर मोड़ पे तू ही मिलता है।
तू जब थक जाती होगी,
तो मेरा नाम लेती होगी,
मैं भी हर मुश्किल में,
तुझसे ही ताकत लेता हूँ।
ये प्यार कोई साधारण नहीं,
ये दूरी में भी पूरा है,
दो शहरों के बीच पला,
पर एक दिल में ही अधूरा है।
तेरे शहर की रोशनी में,
मेरे सपनों की चमक है,
मेरे शहर की खामोशी में,
तेरी आवाज़ की झलक है।
कभी अगर हम मिल जाएं,
तो शायद वक्त रुक जाएगा,
दो शहरों का हर किस्सा,
एक कहानी बन जाएगा।
मैं तुझे अपने शहर दिखाऊँगा,
हर वो जगह जहाँ तेरा नाम है,
तू मुझे अपने शहर घुमाएगी,
जहाँ हर मोड़ पे मेरा ख्वाब है।
हम हँसेंगे उन फासलों पर,
जो कभी हमें रुलाते थे,
और उन रातों को याद करेंगे,
जो हमें तड़पाते थे।
तेरे साथ चलते-चलते,
मैं खुद को पा लूंगा,
और तू मेरे साथ रहकर,
हर दूरी को भुला देगी।
पर अगर मिलना न भी हो पाया,
तो भी ये प्यार कम नहीं होगा,
दो शहरों में बंटकर भी,
ये दिल कभी दो नहीं होगा।
क्योंकि मोहब्बत जगह की मोहताज नहीं,
ये तो बस एहसास का नाम है,
जो दिल में बस जाए एक बार,
तो हर शहर उसका मुकाम है।
मैं यहाँ रहकर भी तेरा हूँ,
तू वहाँ रहकर भी मेरी है,
दो शहरों की ये दूरी,
बस एक कहानी अधूरी है।
और एक दिन ये अधूरी कहानी,
पूरा मुकाम पा जाएगी,
जब दो शहरों के बीच की दूरी,
हमारे कदमों में सिमट जाएगी।
तब ना कोई नक्शा होगा,
ना कोई फासला बीच में,
बस तू होगी, मैं होऊँगा,
और एक दिल धड़कता होगा सीने में।
दो शहरों की ये दास्तां,
फिर एक गीत बन जाएगी,
हर जुदाई की वो रात,
मिलन की सुबह बन जाएगी।
और मैं तुझसे कहूँगा—
“देख, ये दूरी कुछ भी नहीं थी,
बस हमारी मोहब्बत की परीक्षा थी,
जो हमने साथ मिलकर जीती।”
तू मुस्कुराकर कहेगी—
“हाँ, दो शहर थे जरूर,
पर दिल तो हमेशा एक ही था।”
और तब ये दुनिया भी समझेगी,
कि प्यार सीमाओं में नहीं बंधता,
ये तो हवाओं की तरह है,
जो हर शहर में एक जैसा बहता।
आज भी जब मैं तेरे बारे में सोचता हूँ,
तो ये शहर छोटा लगने लगता है,
जैसे तेरी यादों ने,
हर कोने को अपना बना लिया है।
मैं यहाँ हूँ, तू वहाँ है,
पर कहानी एक ही चल रही है,
दो शहरों में बंटी ज़िंदगी,
एक ही दिल में पल रही है।
और जब भी कोई पूछता है—
“कहाँ रहती है वो?”
मैं मुस्कुराकर कहता हूँ—
“दो शहरों में नहीं…
वो तो मेरे दिल में रहती है।”
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| शीर्षक: दो शहर, एक दिल |


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