अनकहा प्रेम – जो कभी कहा नहीं गया

अनकहा प्रेम – जो कभी कहा नहीं गया


अनकहा प्रेम – जो कभी कहा नहीं गया


शब्द कभी-कभी छोटे पड़ जाते हैं,
और खामोशी लंबी हो जाती है।
जैसे दो दिलों के बीच कोई पुल बना हो,
पर उस पर कोई कदम रखने की हिम्मत न करता हो।
हम मिले थे यूँ ही,
जैसे बारिश की पहली बूंद मिट्टी को छूती है —
धीरे, संकोच से,
बिना आवाज़ किए।

तुम्हारी आँखों में एक सवाल था,
मेरी आँखों में उसका जवाब,
पर दोनों ने नज़रें झुका लीं,
क्योंकि समाज की दीवारें शब्दों से ऊँची थीं।
हम दोस्त कहलाते रहे,
पर दोस्ती से गहरा कुछ था —
जो हर मुस्कान के पीछे छिपा रहता,
हर चुप्पी में धड़कता।

तुम चाय पीते हुए हमेशा कप को दोनों हाथों से पकड़ती,
और मैं उस पल को पकड़ लेना चाहता था।
तुम बालों को कान के पीछे करती,
और मेरा दिल कहीं अटक जाता।

हमारी बातें साधारण थीं —
मौसम, काम, रास्ते, किताबें,
पर हर शब्द के नीचे एक अनकहा अर्थ था,
जिसे सिर्फ दिल समझते थे।
कभी तुम अचानक चुप हो जाती,
और मैं पूछ नहीं पाता — “क्या हुआ?”
क्योंकि डर था,
कि सवाल पूछते ही सच बाहर आ जाएगा।

तुम्हारी हँसी में एक घर था,
जहाँ मैं रहना चाहता था,
पर दरवाज़े पर लिखा था —
“यहाँ आने की अनुमति नहीं।”

हम साथ चलते थे,
पर कदमों के बीच दूरी रखकर,
जैसे किसी ने अदृश्य रेखा खींच दी हो।

एक दिन तुमने कहा —
“कुछ बातें कह देने से सब बदल जाता है।”

और मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया —
“शायद इसलिए कुछ बातें नहीं कहनी चाहिए।”
उस दिन हमारी आँखों ने झूठ बोला था।

वो बारिश वाली शाम याद है?
जब बस स्टॉप खाली था,
और हम दोनों भीगते हुए भी छाते के नीचे नहीं आए।

तुम्हारे होंठ काँपे थे,
जैसे कोई शब्द बाहर आना चाहता हो,
पर हवा ने उसे रोक लिया।
मैंने चाहा कि तुम्हारा हाथ पकड़ लूँ,
पर मेरी उँगलियाँ जेब में ही बंद रहीं।

हम दोनों जानते थे —
यह सिर्फ दोस्ती नहीं है।
पर हम दोनों डरते थे —
कि अगर कह दिया, तो शायद खो देंगे।
समाज की आँखें हमारे पीछे थीं,
रिश्तों के नियम हमारे सामने,
और दिल बीच में खड़ा था —
अकेला।

समय आगे बढ़ता रहा,
जैसे नदी बहती है बिना रुके।
तुम्हारी शादी की खबर आई,
और मैंने सबसे पहले तुम्हें बधाई दी।
मेरी आवाज़ स्थिर थी,
पर अंदर कुछ टूट गया था।
तुमने कहा —
“तुम खुश हो ना?”
मैंने कहा — “हाँ।”
और उस “हाँ” में हजारों अधूरे वाक्य छिपे थे।

तुम्हारी विदाई के दिन,
मैं भीड़ में खड़ा था,
पर तुम्हारी नज़र सिर्फ मुझे ढूँढ रही थी।
एक पल के लिए हमारी आँखें मिलीं —
और उस पल में पूरा जीवन था।
तुम्हारी आँखों ने पूछा —
“क्यों नहीं कहा?”
मेरी आँखों ने जवाब दिया —
“डर गया था।”
साल गुजर गए।

अब हम अलग शहरों में हैं,
अलग जीवन में,


अलग कहानियों में।
पर जब भी बारिश होती है,
तुम्हारी यादें खिड़की पर दस्तक देती हैं।
मैं सोचता हूँ —
क्या होता अगर उस दिन कह देता?
क्या होता अगर तुम्हारा हाथ पकड़ लेता?
क्या होता अगर हम समाज से लड़ जाते?
ये “क्या होता” मेरे जीवन का सबसे लंबा सवाल बन गया है।

एक दिन अचानक मुलाकात हुई।
तुम बदल चुकी थी —
पर आँखें वही थीं।
मैं भी बदल गया था —
पर दिल वहीं अटका था।
हमने सामान्य बातें कीं,
पर हवा भारी थी।
तुमने धीरे से कहा —
“हम कभी सच में दोस्त नहीं थे, है ना?”
मैं चुप रहा।

फिर तुमने मुस्कुराकर कहा —
“हम डर गए थे।”
उस पल समय रुक गया।
भावनाओं का तूफान अंदर उठा,
जैसे वर्षों से बंद दरवाज़ा अचानक खुल गया हो।
मैंने पहली बार तुम्हारी आँखों में बिना डर देख लिया।
और तुमने कहा —
“मैंने हमेशा तुम्हें चाहा था।”
मेरे होंठ काँप गए।
मैंने कहा —
“मैं भी।”
पर यह स्वीकारोक्ति देर से आई थी —
जैसे ट्रेन निकल जाने के बाद टिकट मिल जाए।
हम दोनों हँसे,
पर आँखों में आँसू थे।

यह प्रेम अधूरा नहीं था,
बस अनकहा था।
यह खत्म नहीं हुआ था,
बस किसी और जीवन में खो गया था।

हमने एक-दूसरे को विदा कहा,
इस बार सच जानते हुए।
तुमने जाते-जाते कहा —
“कुछ प्रेम कहे बिना भी पूरे होते हैं।”
मैंने सिर हिलाया।
पर दिल जानता था —
कुछ प्रेम पूरे नहीं होते,
बस यादों में जीवित रहते हैं।


अनकहा प्रेम – जो कभी कहा नहीं गया




अब जब रात होती है,
और खामोशी मेरे कमरे में फैलती है,
मैं तुम्हारी आँखों से बातें करता हूँ।
वो आँखें जो कभी सब कह देती थीं,
पर हमने सुनने से इनकार कर दिया।
अनकहा प्रेम शायद यही होता है —
जहाँ शब्द हार जाते हैं,
और एहसास जीत जाते हैं।

जहाँ दो लोग एक-दूसरे के लिए बने होते हैं,
पर समय उनके खिलाफ लिख दिया जाता है।
और फिर भी —
दिल के किसी कोने में
हमेशा एक रोशनी जलती रहती है…
तुम्हारे नाम की।

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