चाँद से शिकायत है मुझे
** चाँद से शिकायत है मुझे **
![]() |
| चाँद से शिकायत है मुझे |
चाँद से शिकायत है मुझे,
हाँ… वही चाँद
जो हर रात मेरी खिड़की पर आकर
तुम्हारी यादों की चादर बिछा जाता है।
वही चाँद,
जो मेरे हर खामोश लम्हे का गवाह है—
मेरी धड़कनों की बेचैनी,
मेरी आँखों की नमी,
और तुम्हारे नाम की धीमी-सी गूंज।
चाँद से शिकायत है मुझे…
कि उसने तुम्हें भी देखा है,
और मुझे भी—
पर कभी ये नहीं बताया
कि हम दोनों एक ही आसमान के नीचे
एक-दूसरे के लिए तरसते रहे।
मैंने उससे पूछा था एक रात—
“क्या तुमने उसे देखा है?”
वो मुस्कुराया…
और चुप हो गया।
उसकी वही खामोशी
मेरे दिल में एक तूफान छोड़ गई—
क्योंकि उस चुप्पी में
तुम्हारी झलक थी।
चाँद से शिकायत है मुझे…
कि वो हर रात तुम्हारे शहर में भी चमकता है,
और मेरे शहर में भी—
फिर भी
हमारी दूरियों को कम नहीं करता।
तुम्हारी खिड़की पर
वो उतनी ही नरमी से उतरता होगा
जितनी नरमी से
वो मेरी रातों को छूता है—
तो फिर क्यों
तुम्हारी नींद में मेरा नाम नहीं आता?
क्यों तुम्हारी आँखों में
मेरी तस्वीर नहीं बनती?
चाँद से शिकायत है मुझे…
कि वो हर बार तुम्हारी यादों को
और गहरा कर देता है।
जब भी मैं उसे देखता हूँ,
उसकी रोशनी में
तुम्हारा चेहरा उभर आता है—
जैसे किसी अधूरी कहानी का
सबसे खूबसूरत किरदार।
वो जानता है
कि मैं तुम्हें भूल नहीं सकता—
फिर भी हर रात
तुम्हारी याद दिलाने चला आता है।
क्या ये उसकी साजिश है?
या तुम्हारी कोई खामोश अदा…?
कभी-कभी लगता है
चाँद तुम्हारा साथी है—
तुम्हारे हर राज़ को जानता है,
तुम्हारी हर मुस्कान का कारण है,
और मेरी हर बेचैनी का जिम्मेदार भी।
मैंने उससे कहा—
“अगर तुम उसे जानते हो,
तो मेरा हाल भी बता देना।”
पर वो बस चमकता रहा…
जैसे उसे फर्क ही नहीं पड़ता।
चाँद से शिकायत है मुझे…
कि उसने तुम्हें इतना खूबसूरत क्यों बनाया?
क्यों तुम्हारी आँखों में
उसकी चाँदनी-सी चमक भर दी?
क्यों तुम्हारी मुस्कान को
इतना नशा दे दिया
कि मैं हर बार खो जाऊँ?
अगर तुम साधारण होती—
तो शायद मैं इतना नहीं टूटता,
इतना नहीं लिखता,
इतना नहीं चाहता…
पर तुम तो चाँद की तरह हो—
दूर… पर बेहद करीब लगती हुई।
![]() |
| चाँद से शिकायत है मुझे |
छूना चाहूँ तो
बस रोशनी हाथ में आती है—
तुम नहीं।
चाँद से शिकायत है मुझे…
कि वो हर बार
मेरी उम्मीदों को जगा देता है।
तुम्हें याद करके—
तो वो आकर कहता है
“वो भी तुम्हें याद करती होगी।”
और मैं…
फिर से उसी उम्मीद में
एक और रात काट देता हूँ।
पर सुबह होते ही
सब कुछ फिर अधूरा रह जाता है।
चाँद झूठा है…
या फिर
मैं ही बहुत सच्चा हूँ?
ये सवाल
हर रात मेरे भीतर
एक नया जख्म बनाता है।
चाँद से शिकायत है मुझे…
कि उसने हमारी कहानी देखी—
पर कभी उसे पूरा नहीं होने दिया।
वो गवाह था
उस पहली मुलाकात का,
उस पहली मुस्कान का,
उस पहली नजर के ठहर जाने का…
वो जानता है
कि कैसे तुम्हारी आँखों में
मैंने अपना घर देखा था—
और कैसे उसी घर से
मुझे बेघर कर दिया गया।
फिर भी…
वो हर रात
वैसी ही मासूमियत से चमकता है—
जैसे कुछ हुआ ही न हो।
कितना निर्दयी है ना वो?
या शायद…
वो भी मेरी तरह
कुछ कह नहीं पाता।
चाँद से शिकायत है मुझे…
कि वो मेरी कविताओं का हिस्सा बन गया है।
हर शब्द में,
हर पंक्ति में,
हर खामोशी में—
वो तुम्हें छुपाकर बैठा है।
मैं जब भी लिखता हूँ,
वो तुम्हारा चेहरा बना देता है—
और मेरी हर कविता
तुम पर खत्म हो जाती है।
मैं चाहता हूँ
कि कभी एक कविता
मेरे बारे में भी हो—
पर नहीं…
तुम और चाँद
मिलकर मुझे
हर बार अधूरा कर देते हो।
कभी-कभी सोचता हूँ—
क्या चाँद को भी
तुमसे प्यार हो गया है?
क्योंकि जिस तरह वो
तुम्हें निहारता है,
वैसे ही मैं भी देखता हूँ।
और शायद इसलिए
वो मुझे तुमसे दूर रखता है—
क्योंकि वो तुम्हें
किसी के साथ बाँटना नहीं चाहता।
चाँद से शिकायत है मुझे…
कि वो मेरे सपनों में आता है—
और तुम्हें साथ ले आता है।
वो हमें मिलाता है,
हँसाता है,
बातें करवाता है—
और फिर अचानक
सुबह कर देता है।
क्यों?
क्यों हर खूबसूरत पल
इतना छोटा होता है?
क्यों हर सपना
टूटने के लिए ही बनता है?
चाँद जवाब नहीं देता…
बस मुस्कुराता है—
जैसे उसे सब पता हो,
पर बताना न चाहता हो।
चाँद से शिकायत है मुझे…
पर शायद
मुझे खुद से भी शिकायत है।
कि मैंने तुम्हें
चाँद से जोड़ दिया—
और अब
हर रात तुम्हारी हो गई।
अब हर रोशनी में
तुम दिखती हो,
हर अंधेरे में
तुम्हारी कमी महसूस होती है।
तुम मेरी आदत बन गई हो—
और चाँद
उस आदत की याद दिलाने वाला अलार्म।
फिर भी…
मैं उससे नाराज़ नहीं रह पाता।
क्योंकि वही तो है
जो तुम्हारे करीब है,
जो तुम्हें हर रात देखता है,
जो मेरी तरफ से
तुम्हें छूता है।
शायद…
वो ही हमारा रिश्ता है—
एक खामोश पुल,
जो हमें जोड़े रखता है।
तो आज…
मैं अपनी शिकायत
वापस लेता हूँ।
चाँद से नहीं,
अब मैं उससे एक विनती करता हूँ—
“जब भी तुम उसे देखो,
तो मेरी याद भी साथ ले जाना,
जब वो मुस्कुराए—
तो उसमें मेरा नाम भी छुपा देना।”
और अगर कभी
वो तुम्हें देखकर
मेरे बारे में सोचे—
तो बस इतना कहना…
“वो अब भी तुम्हें
हर रात लिखता है।”
चाँद से शिकायत थी मुझे—
पर अब…
वो मेरा सबसे बड़ा सहारा है।
क्योंकि जब तुम नहीं होती,
तो वही होता है—
मेरे पास,
मेरी कविताओं में,
मेरी सांसों में।
![]() |
| चाँद से शिकायत है मुझे |
और शायद…
इसीलिए
मैं आज भी लिख पा रहा हूँ—
“तुम और चाँद…
दोनों ही मेरी अधूरी मोहब्बत के
सबसे खूबसूरत गवाह हो।”



टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें