# जिसे कभी अपना कह न सका

 # जिसे कभी अपना कह न सका


# जिसे कभी अपना कह न सका


जिसे कभी अपना कह न सका,

उसे दिल से भुला भी न सका,

वो नाम जो होंठों तक आया,

मैं दुनिया के डर से कह न सका।


जिसे कभी अपना कह न सका,

उसे दिल से भुला भी न सका...


पहली बार जब देखा था तुझको,

जैसे कोई सपना जागा था,

सूने दिल की वीरान राहों में,

प्यार का पहला फूल खिला था।


तेरी आँखों में जैसे

पूरा आसमान उतर आया था,

और मेरी धड़कनों ने

तेरा नाम चुपके से गाया था।


पर मैं अपने ही डर का कैदी,

दिल का दरवाज़ा खोल न सका,

जिसे कभी अपना कह न सका,

उसे दिल से भुला भी न सका।


तेरे साथ बिताए वो पल,

आज भी यादों में जीते हैं,

तेरी हँसी की मीठी धुन पर

मेरे अधूरे गीत सिसकते हैं।


तू पास थी तो शब्द नहीं थे,

अब शब्द हैं, तू साथ नहीं,

किस्मत भी कैसी पहेली है,

अब कोई नई बात नहीं।


मैं चाहकर भी तुझसे

अपने दिल का हाल कह न सका,

जिसे कभी अपना कह न सका,

उसे दिल से भुला भी न सका।


कितनी शामें तेरे नाम लिखीं,

कितनी रातें जागकर काटीं,

कितनी बार तेरी तस्वीर से

मैंने अपनी बातें बाँटी।


चाँद से तेरी बातें पूछीं,

तारों से तेरा पता लिया,

हर दुआ में बस तुझे माँगा,

हर साँस में तेरा नाम लिया।


मगर सामने जब तू आई,

मैं नज़रों से आगे बढ़ न सका,

जिसे कभी अपना कह न सका,

उसे दिल से भुला भी न सका।


मुझे याद है वो बारिश का मौसम,

जब भीग रही थी तू हँसकर,

दिल कहता था हाथ थाम लूँ,

तेरे संग चलूँ कुछ दूर तक।


लेकिन डर था कहीं खो न दूँ,

जो रिश्ता अभी तक बचा हुआ,

इस डर ने मुझसे छीन लिया,

हर सपना जो था सजा हुआ।


मैं दिल की आवाज़ सुनकर भी,

एक कदम आगे बढ़ न सका,

जिसे कभी अपना कह न सका,

उसे दिल से भुला भी न सका।


फिर एक दिन खबर मिली,

तेरी दुनिया कहीं और बस गई,

जिसे मैं अपनी मंज़िल समझा,

वो किसी और की राह बन गई।


उस दिन दिल ने रोकर पूछा,

क्या प्यार इतना कमजोर था?

या मेरी खामोशी ही

मेरे सपनों का चोर था?


मैं लाख चाहकर भी

अपना मुकद्दर बदल न सका,

जिसे कभी अपना कह न सका,

उसे दिल से भुला भी न सका।


अब भी कभी-कभी तन्हाई में,

तेरी यादों का मेला लगता है,

हर गुज़रा हुआ लम्हा जैसे

फिर से मेरे पास आता है।


वो मुस्कान, वो मासूम बातें,

वो आँखों की चमक पुरानी,

सब कुछ आज भी जिंदा है,

बस खत्म हुई है कहानी।


मैं वक्त के साथ चल तो पड़ा,

पर तुझसे आगे निकल न सका,

जिसे कभी अपना कह न सका,

उसे दिल से भुला भी न सका।


कई लोगों ने दस्तक दी,

मेरे सूने दिल के दरवाज़े पर,

लेकिन तेरी यादों का पहरा था

हर खिड़की, हर रास्ते पर।


कोई तुझ-सा लगा नहीं,

कोई दिल में उतर पाया नहीं,

जिस जगह तेरा नाम लिखा था,

वहाँ कोई और आया नहीं।


मैं खुद को लाख समझाता रहा,

पर दिल को कभी समझा न सका,

जिसे कभी अपना कह न सका,

उसे दिल से भुला भी न सका।


शायद अगर उस दिन

मैं अपने दिल की बात कह देता,

तो किस्मत का यह पन्ना

कुछ और कहानी लिख देता।


शायद तू मुस्कुरा देती,

शायद तेरा जवाब हाँ होता,

शायद हमारे सपनों का

एक छोटा-सा जहाँ होता।


लेकिन "शायद" के सहारे

मैं अतीत को बदल न सका,

जिसे कभी अपना कह न सका,

उसे दिल से भुला भी न सका।



अब उम्र की शाम ढलती है,

यादों का सूरज बाकी है,

तेरी मोहब्बत अधूरी सही,

पर उसका असर अभी बाकी है।


तू जहाँ भी हो, खुश रहना,

यही मेरी आख़िरी दुआ है,

मेरा प्यार किसी मंज़िल का नहीं,

बस तेरी खुशी की हवा है।


मैं तुझे पाने की चाह में

अपना जीवन जी न सका,

पर तुझे चाहना छोड़ दूँ,

ये भी कभी कर न सका।


जिसे कभी अपना कह न सका,

उसे दिल से भुला भी न सका,

वो नाम जो होंठों तक आया,

मैं दुनिया के डर से कह न सका।


# जिसे कभी अपना कह न सका


आज भी दिल के मंदिर में,

उसकी यादों का दीप जला,

मैं जीवनभर उससे प्रेम तो करता रहा,

पर उसे कभी अपना कह न सका...


उसे कभी अपना कह न सका...

उसे कभी अपना कह न सका...


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