तुम्हारे बिना हर त्योहार अधूरा है

 तुम्हारे बिना हर त्योहार अधूरा है


 तुम्हारे बिना हर त्योहार अधूरा है

आज फिर आँगन में
रंगोली तो सजी है,
दीयों की लौ भी
पहले जैसी ही जली है।

घर की दीवारों पर
रोशनी की चादर बिछी है,
मिठाइयों की खुशबू
हर कोने में फैली है।

बच्चों की हँसी,
बुज़ुर्गों की दुआएँ,
दोस्तों की महफ़िल,
रिश्तों की सौगातें—

सब कुछ तो है यहाँ,
फिर भी न जाने क्यों
दिल के किसी कोने में
एक अजीब सी ख़ामोशी है।

क्योंकि...

तुम्हारे बिना
हर त्योहार अधूरा है।

दीवाली आती है,
हज़ारों दीप जलते हैं,
लेकिन मेरे मन का
एक कोना अब भी अँधेरा रहता है।

हर दीपक से पूछता हूँ—

"क्या तुम्हारी रोशनी
उसे मेरे पास ला सकती है?"

दीपक चुप रहता है।

उसकी लौ बस
धीरे-धीरे काँपती रहती है,
जैसे उसे भी
मेरे इंतज़ार का एहसास हो।

होली आती है।

लोग एक-दूसरे को
रंगों से भर देते हैं।

गुलाल उड़ता है,
ढोल बजते हैं,
हँसी के रंग
आसमान तक पहुँच जाते हैं।

लेकिन मेरे हाथों का
एक रंग हमेशा बच जाता है।

वह रंग
जो सिर्फ तुम्हारे चेहरे पर
लगाना चाहता था।

तुम्हारी हँसी के बिना
होली के सारे रंग
मुझे फीके लगते हैं।

रक्षाबंधन हो,
करवा चौथ हो,
ईद की मीठी सेवइयाँ हों,
या फिर क्रिसमस की जगमगाती रात—

हर उत्सव
मुझे तुम्हारी याद दिलाता है।

क्योंकि तुमने ही तो सिखाया था
कि त्योहार
सिर्फ तारीख़ नहीं होते।

वे उन लोगों के नाम होते हैं
जिनके साथ
हम उन्हें जीते हैं।

मुझे आज भी याद है...

पहली दीवाली
जब तुमने अपने हाथों से
दीया जलाया था।

उस छोटे से दीपक की रोशनी में
तुम्हारी मुस्कान
पूरे घर से ज़्यादा चमक रही थी।

मैंने मज़ाक में कहा था—

"इतने सारे दीयों की क्या ज़रूरत है?
एक तुम्हारी मुस्कान ही काफ़ी है।"

तुम हँस पड़ी थीं।

और सच कहूँ,
उस दिन से लेकर आज तक
मैंने वैसी रोशनी
फिर कभी नहीं देखी।

पहली होली भी याद है।

तुम बार-बार
मुझसे छिपने की कोशिश करती रहीं।

लेकिन जब मैंने
तुम्हारे गालों पर
हल्का सा गुलाल लगाया,

तो तुमने आँखें बंद करके
बस इतना कहा—

"अब हर होली
इसी तरह मनाएँगे।"

समय ने शायद
वह वादा सुन लिया था।

इसलिए उसने
उसे अधूरा छोड़ दिया।

अब हर साल
त्योहार लौट आते हैं।

लेकिन तुम नहीं आतीं।

कैलेंडर बदलते हैं।

मौसम बदलते हैं।

लोग बदल जाते हैं।

लेकिन मेरा इंतज़ार
आज भी वहीं खड़ा है,

जहाँ तुमने
आख़िरी बार मुड़कर देखा था।

माँ आज भी पूछती हैं—

"बेटा, मिठाई नहीं खाओगे?"

मैं मुस्कुरा देता हूँ।

कैसे बताऊँ,

जिस मिठास का नाम तुम थीं,

उसके जाने के बाद
शक्कर भी फीकी लगने लगी है।

दोस्त कहते हैं—

"ज़िंदगी आगे बढ़ चुकी है।"

मैं सिर हिला देता हूँ।

हाँ...

ज़िंदगी आगे बढ़ गई है।

लेकिन कुछ यादें
चलना नहीं जानतीं।

वे वहीं बैठ जाती हैं,

जहाँ किसी ने
दिल छोड़ दिया हो।

कभी-कभी
रात के सन्नाटे में

मैं अलमारी खोलता हूँ।

तुम्हारे दिए हुए
वो छोटे-छोटे तोहफ़े,

वो पुराने कार्ड,

वो सूखा हुआ गुलाब,

आज भी
उतनी ही ख़ामोशी से
मेरा इंतज़ार करते हैं,

जितनी ख़ामोशी से
मैं तुम्हारा करता हूँ।

हर त्योहार पर

मैं तुम्हारे नाम का
एक दीपक अलग से जलाता हूँ।

कोई पूछता है—

"यह किसके लिए?"

मैं मुस्कुरा देता हूँ।

कुछ रिश्तों का परिचय
शब्दों से नहीं दिया जा सकता।

उन्हें सिर्फ महसूस किया जाता है।

इस बार भी

आँगन सजाया है।

दीये रखे हैं।

फूल बिछाए हैं।

दरवाज़ा खुला छोड़ा है।

कहीं ऐसा न हो

कि तुम लौट आओ,

और दरवाज़ा बंद मिले।

शायद यह उम्मीद
बचपना हो।

शायद यह इंतज़ार
पागलपन हो।

लेकिन प्रेम

हमेशा तर्क से नहीं चलता।

वह तो बस
दिल की धड़कनों में
अपना घर बना लेता है।


तुम्हारे बिना हर त्योहार अधूरा है


मैंने अब शिकायत करना छोड़ दिया है।

किस्मत से भी,

समय से भी,

और भगवान से भी।

बस एक छोटी-सी दुआ करता हूँ—

जहाँ भी हो,

खुश रहना।

अगर कभी

किसी त्योहार की रात

तुम्हें अचानक

मेरी याद आ जाए,

तो आसमान की ओर देख लेना।

मैं भी उसी समय

किसी तारे को देखकर

तुम्हारा नाम ले रहा होऊँगा।

शायद हमारी दुआएँ

आसमान के किसी मोड़ पर

एक-दूसरे से मिल जाएँ।

और अगर

कभी अगले जन्म में

फिर से मिलना हुआ,

तो मैं भगवान से

बस एक ही वरदान माँगूँगा—

मुझे ऐसा प्रेम देना,

जो किसी त्योहार का

मोहताज न हो,

लेकिन ऐसा साथ भी देना,

कि कोई त्योहार

कभी अधूरा न रहे।

क्योंकि मैंने समझ लिया है—

त्योहार

दीयों से नहीं जगमगाते,

रंगों से नहीं महकते,

मिठाइयों से नहीं मीठे बनते।

वे तो

उन लोगों की मौजूदगी से

पूरे होते हैं,

जिन्हें हम

अपने दिल से भी ज़्यादा चाहते हैं।

और मेरी ज़िंदगी का

सबसे बड़ा सच

आज भी वही है—

दीवाली की हर लौ,

होली का हर रंग,

ईद की हर दुआ,

क्रिसमस का हर सितारा,

नववर्ष की हर सुबह,

और सावन की हर पहली बारिश

मुझसे बस एक ही बात कहती है—

"तुम्हारे बिना
हर त्योहार अधूरा है..."

और शायद...

मेरी ज़िंदगी भी।

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