पत्थरों के बीच रास्ता
पत्थरों के बीच रास्ता
कहते हैं,
रास्ते कभी आसान नहीं होते,
वे अपनी मंज़िल तक पहुँचने से पहले
हर मुसाफ़िर की हिम्मत को परखते हैं।
मैं भी एक मुसाफ़िर हूँ,
सपनों की गठरी कंधों पर उठाए,
उम्मीदों का दीप हाथों में लिए,
और विश्वास को दिल में बसाए
एक लंबी यात्रा पर निकला था।
मैंने सोचा था—
रास्ते फूलों से सजे होंगे,
हवा गीत गाएगी,
आसमान हर कदम पर
मुझे दुआएँ देगा।
लेकिन जब सफर शुरू हुआ,
तो सामने फूल नहीं,
पत्थरों का एक लंबा संसार था।
नुकीले पत्थर,
ऊँचे पत्थर,
भारी पत्थर,
और कुछ ऐसे पत्थर
जो केवल रास्ता ही नहीं,
हौसला भी रोकना चाहते थे।
पहले ही कदम पर
मेरे पाँव घायल हो गए।
दर्द हुआ।
इतना दर्द
कि लगा अब आगे बढ़ना
शायद संभव नहीं।
मैं बैठ गया।
पत्थर के किनारे,
आँखों में नमी लेकर।
तभी हवा ने
धीरे से मेरे कानों में कहा—
"जो मंज़िलें इतिहास बनती हैं,
उनके रास्ते कभी आसान नहीं होते।"
मैंने अपने आँसू पोंछे,
घुटनों से धूल झाड़ी,
और फिर उठ खड़ा हुआ।
हर कदम पर
एक नया पत्थर मिला।
कभी किसी ने कहा—
"तुमसे नहीं होगा।"
वह भी एक पत्थर था।
कभी अपनों ने कहा—
"इतने बड़े सपने मत देखो।"
वह भी एक पत्थर था।
कभी किस्मत ने
दरवाज़े बंद कर दिए।
वह भी एक पत्थर था।
कभी मेहनत का फल
देर से मिला।
वह भी एक पत्थर था।
लेकिन मैंने देखा,
नदी भी तो
पत्थरों से लड़ती नहीं।
वह उन्हें तोड़ती भी नहीं।
बस,
उनके बीच से
अपना रास्ता बना लेती है।
तभी मैंने समझा—
ताकत हमेशा टकराने में नहीं,
बहते रहने में होती है।
मैंने शिकायत करना छोड़ दिया।
पत्थरों को दोष देना छोड़ दिया।
अब मैं उन्हें
अपना शिक्षक मानने लगा।
हर पत्थर
मुझे कुछ नया सिखाने लगा।
एक पत्थर ने
धैर्य सिखाया।
दूसरे ने
संघर्ष।
तीसरे ने
आत्मविश्वास।
और चौथे ने
मुस्कुराकर गिरना।
क्योंकि
जो गिरकर उठना सीख जाता है,
उसे कोई हार
लंबे समय तक रोक नहीं सकती।
एक दिन
मैंने देखा—
जिस पत्थर से
मैं ठोकर खाता था,
आज उसी पर खड़ा होकर
मैं दूर तक देख पा रहा था।
तब समझ आया,
मुश्किलें
हमें गिराने नहीं,
ऊँचा उठाने आती हैं।
रास्ता अब भी कठिन था।
धूप तेज़ थी।
प्यास बढ़ रही थी।
लेकिन भीतर
एक नया विश्वास जन्म ले चुका था।
अब मैं
मंज़िल के लिए नहीं,
अपने सपनों के सम्मान के लिए चल रहा था।
कुछ लोग
रास्ते में मिलते रहे।
किसी ने हँसकर कहा—
"इतनी मेहनत क्यों?"
मैं मुस्कुरा दिया।
क्योंकि उन्हें
सिर्फ पत्थर दिखाई देते थे।
मुझे
उनके पार की मंज़िल दिखाई देती थी।
कुछ लोग लौट गए।
कुछ लोग थक गए।
कुछ लोग
पत्थरों को देखकर
अपने सपनों का रास्ता बदल बैठे।
लेकिन मैं चलता रहा।
क्योंकि
मैंने नदी से सीखा था—
रुकना नहीं।
बहते रहना।
एक रात
आंधी आई।
इतनी भयानक
कि लगा सब कुछ खत्म हो जाएगा।
आसमान गरज रहा था।
बिजलियाँ चमक रही थीं।
मेरे भीतर का डर
फिर जाग उठा।
मैंने आसमान की ओर देखा
और पूछा—
"क्या मेरी परीक्षा अभी बाकी है?"
जवाब में
बारिश की बूँदें गिरने लगीं।
हर बूँद
जैसे कह रही थी—
"हाँ,
लेकिन हर परीक्षा के बाद
एक नई सुबह आती है।"
सुबह सचमुच आई।
सूरज निकला।
उसकी पहली किरण
उन पत्थरों पर पड़ी,
जो रात भर
मुझे डरावने लग रहे थे।
अब वही पत्थर
सोने की तरह चमक रहे थे।
मैं मुस्कुरा पड़ा।
समझ गया—
दृष्टिकोण बदलते ही
दुनिया बदल जाती है।
अब सफर
सिर्फ मेरा नहीं था।
मेरे पीछे
कुछ और मुसाफ़िर चल रहे थे।
वे मेरे पैरों के निशान देखकर
अपना रास्ता खोज रहे थे।
तब मैंने महसूस किया—
जब हम हार नहीं मानते,
तो केवल अपनी मंज़िल नहीं पाते,
बल्कि
दूसरों के लिए भी
एक नया रास्ता छोड़ जाते हैं।
आज
जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ,
तो मुझे
पत्थर दिखाई नहीं देते।
मुझे दिखाई देती है—
मेरी मेहनत,
मेरा संघर्ष,
मेरी हिम्मत,
मेरे आँसू,
मेरी मुस्कान,
और हर वह पल
जिसने मुझे
आज का इंसान बनाया।
अगर रास्ता आसान होता,
तो शायद
मैं इतना मजबूत कभी नहीं बनता।
अगर पत्थर न होते,
तो शायद
मुझे अपनी ताकत का पता ही नहीं चलता।
आज मैं
हर उस पत्थर का
दिल से धन्यवाद करता हूँ,
जिसने कभी मुझे रोका था।
क्योंकि
उसी ने मुझे
चलना सिखाया।
उसी ने
संभलना सिखाया।
उसी ने
गिरकर उठना सिखाया।
और उसी ने
यह विश्वास दिया कि—
रास्ते कभी खत्म नहीं होते,
सिर्फ हमारा साहस
उन्हें नया अर्थ देता है।
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| पत्थरों के बीच रास्ता |
इसलिए
अगर कभी
तुम्हें भी जीवन के रास्ते में
पत्थरों का पहाड़ दिखाई दे,
तो डरना मत।
उन्हें देखकर
अपने कदम मत रोकना।
याद रखना—
पत्थर मंज़िल के दुश्मन नहीं होते,
वे तुम्हारी कहानी के
सबसे खूबसूरत अध्याय होते हैं।
जब लोग
तुम्हारी सफलता की कहानी पढ़ेंगे,
तो उन्हें सिर्फ मंज़िल दिखाई देगी।
लेकिन तुम जानते होगे
कि उस मंज़िल तक पहुँचने के लिए
तुमने कितने पत्थरों के बीच
अपना रास्ता बनाया था।
और उसी दिन
तुम मुस्कुराकर कह सकोगे—
"मैंने हार को रास्ता बनाया,
मुश्किलों को साथी बनाया,
पत्थरों से डरने के बजाय
उन्हें अपनी सीढ़ी बनाया।
क्योंकि जीवन ने मुझे
एक ही बात सिखाई—
रास्ते कभी बनते नहीं,
उन्हें साहस,
मेहनत,
विश्वास
और निरंतर कदमों से
बनाना पड़ता है।
मैं चलता रहा,
पत्थरों के बीच,
और अंत में
मुझे सिर्फ मंज़िल नहीं मिली—
मुझे
खुद से मुलाक़ात मिल गई।"
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