जिसे अपना समझा, वही सबसे दूर चला गया
जिसे अपना समझा, वही सबसे दूर चला गया
कभी-कभी ज़िंदगी हमें ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है,
जहाँ हर चेहरा अपना लगता है,
लेकिन एक दिन वही चेहरा अजनबी बन जाता है।
जिसे दिल की धड़कनों में बसाया था,
जिसे हर दुआ में माँगा था,
जिसे अपना समझा,
वही सबसे दूर चला गया।
वो पहली मुलाक़ात आज भी याद है,
जब हवाओं ने तुम्हारा नाम मेरे कानों में धीरे से कहा था।
सूरज की किरणें जैसे तुम्हारी मुस्कान में उतर आई थीं,
और चाँद भी उस रात कुछ ज़्यादा ही चमका था।
तब लगा था कि किस्मत ने मुझे
मेरे हिस्से की सारी खुशियाँ एक साथ दे दी हैं।
तुम्हारी बातें किसी मीठे गीत जैसी थीं,
जो हर शाम मेरे मन में गूँजती रहती थीं।
तुम्हारी हँसी में ऐसा सुकून था,
जिसे सुनकर हर दर्द भूल जाता था।
मैंने अपने हर अधूरे ख़्वाब में तुम्हारा नाम लिख दिया,
हर रास्ते पर तुम्हारे साथ चलने का सपना देख लिया।
मैंने सोचा था,
यह रिश्ता मौसमों की तरह बदलने वाला नहीं होगा।
यह बरगद की जड़ों जैसा होगा,
जो आँधियों में भी नहीं हिलता।
लेकिन शायद मैं भूल गया था,
कि कुछ लोग सिर्फ़ सफ़र का हिस्सा होते हैं,
मंज़िल का नहीं।
धीरे-धीरे तुम्हारी आवाज़ बदलने लगी,
तुम्हारी बातें छोटी होने लगीं।
जो रातें घंटों की बातचीत में गुज़रती थीं,
वो अब कुछ मिनटों की ख़ामोशी बन गईं।
मैं हर बार वजह ढूँढ़ता रहा,
और तुम हर बार मुस्कुराकर बात टालते रहे।
मैंने अपने दिल को समझाया,
"वो व्यस्त होंगे…
वो थके होंगे…
वो लौट आएँगे…"
लेकिन सच तो यह था,
कि तुम लौटना ही नहीं चाहते थे।
एक दिन तुमने बिना कुछ कहे
अपने कदम पीछे खींच लिए।
न कोई शिकायत,
न कोई बहाना,
न कोई आख़िरी मुलाक़ात।
बस एक लंबी ख़ामोशी,
जो आज तक मेरे भीतर गूँजती है।
उस दिन पहली बार समझ आया,
कि बिछड़ना हमेशा अलविदा कहकर नहीं होता।
कभी-कभी लोग सामने होते हुए भी
हमारी ज़िंदगी से बहुत दूर चले जाते हैं।
मैंने तुम्हें रोकना चाहा,
लेकिन मोहब्बत ज़बरदस्ती नहीं होती।
मैंने तुम्हें पुकारा,
लेकिन शायद मेरी आवाज़
तुम्हारे नए संसार तक पहुँच ही नहीं सकी।
अब हर सुबह तुम्हारी याद से शुरू होती है,
और हर रात तुम्हारे नाम पर खत्म।
चाय का हर प्याला अधूरा लगता है,
बारिश की हर बूँद तुम्हारी कमी का एहसास दिलाती है।
हवा जब भी खिड़की से गुजरती है,
ऐसा लगता है जैसे तुम्हारा कोई अधूरा संदेश साथ लाई हो।
कभी उस रास्ते से गुजरता हूँ,
जहाँ हम साथ चला करते थे।
पेड़ आज भी वहीं खड़े हैं,
बेंच आज भी वैसी ही है,
लेकिन उसके एक कोने पर
अब सिर्फ़ मेरी तन्हाई बैठती है।
लोग कहते हैं,
समय हर घाव भर देता है।
शायद सच कहते होंगे,
लेकिन कुछ ज़ख्म ऐसे भी होते हैं
जो भर तो जाते हैं,
मगर उनका निशान कभी नहीं मिटता।
मैंने मुस्कुराना सीख लिया है,
लेकिन मेरी मुस्कान में अब पहले जैसी बात नहीं।
मैंने लोगों से मिलना शुरू कर दिया है,
लेकिन किसी को दिल से अपना कहना भूल गया हूँ।
तुम्हारे जाने के बाद
मैंने खुद से बहुत सवाल किए।
क्या मेरी मोहब्बत कम थी?
क्या मेरी वफ़ा अधूरी थी?
क्या मेरी दुआओं में कोई कमी रह गई थी?
फिर एक दिन आईने ने जवाब दिया—
"कमी तुममें नहीं थी,
बस मंज़िल अलग-अलग थी।
जिसे रुकना नहीं था,
उसे रोक पाना किसी के बस में नहीं।"
उस दिन पहली बार
मैंने अपने आँसुओं को शिकायत नहीं बनने दिया।
मैंने उन्हें यादों का सम्मान बना दिया।
आज भी जब चाँद निकलता है,
मैं उसे देर तक देखता हूँ।
सोचता हूँ,
शायद तुम भी कहीं उसी चाँद को देख रहे होगे।
शायद तुम्हें भी कभी मेरा ख़याल आता होगा।
शायद किसी गीत की कोई पंक्ति
तुम्हें मेरी याद दिला देती होगी।
अगर ऐसा नहीं भी होता,
तो भी मैं तुम्हें बद्दुआ नहीं देता।
क्योंकि सच्चा प्यार
नफ़रत करना नहीं सिखाता।
वह तो बस दुआ करना जानता है,
चाहे बदले में तन्हाई ही क्यों न मिले।
तुम्हारे जाने के बाद
मैंने जाना कि मोहब्बत पाना ही सब कुछ नहीं होती।
कभी-कभी किसी को पूरे दिल से चाहना ही
ज़िंदगी की सबसे बड़ी दौलत बन जाती है।
अब मैं हर शाम डूबते सूरज से कहता हूँ,
"अगर कभी उससे मिलो,
तो कहना कि यहाँ कोई आज भी
उसकी खुशी के लिए दुआ करता है।"
हर रात सितारों से कहता हूँ,
"अगर उसके रास्ते अँधेरे हों,
तो थोड़ा और चमक जाना।"
हर बारिश से कहता हूँ,
"अगर वह भीग रही हो,
तो उसकी मुस्कान को और खूबसूरत बना देना।"
मैंने तुम्हें खोया ज़रूर है,
लेकिन तुम्हारे साथ बिताए पल
आज भी मेरी सबसे अनमोल पूँजी हैं।
तुम्हारी याद अब दर्द नहीं,
एक शांत नदी की तरह है,
जो मेरे भीतर बहती रहती है।
कभी आँखें नम कर देती है,
तो कभी दिल को यह एहसास दिलाती है
कि मैंने सच में किसी से बेइंतहा मोहब्बत की थी।
आज अगर कोई मुझसे पूछे,
"क्या तुम फिर से प्यार करोगे?"
तो मैं मुस्कुराकर कहूँगा—
"हाँ, ज़रूर करूँगा।
क्योंकि प्यार हारता नहीं,
लोग बिछड़ जाते हैं।"
मैंने यह भी सीखा है
कि हर कहानी का अंत दुखद नहीं होता।
कुछ कहानियाँ हमें इतना मज़बूत बना देती हैं
कि हम टूटकर भी मुस्कुराना सीख जाते हैं।
तुम जहाँ भी हो,
खुश रहना।
अगर कभी मेरी याद आए,
तो मुस्कुरा देना।
यही समझूँगा कि मेरी मोहब्बत
आज भी कहीं ज़िंदा है।
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| जिसे अपना समझा, वही सबसे दूर चला गया |
और मैं…
मैं अपनी यादों की किताब में
तुम्हारा नाम हमेशा सबसे सुंदर अक्षरों में लिखकर रखूँगा।
क्योंकि कुछ रिश्ते साथ चलकर नहीं,
दिल में बसकर अमर हो जाते हैं।
आज भी जब कोई पूछता है,
"तुम्हारी सबसे बड़ी सीख क्या रही?"
तो मैं बस इतना कहता हूँ—
जिसे अपना समझा, वही सबसे दूर चला गया…
लेकिन उसी ने मुझे सिखाया कि
सच्ची मोहब्बत कभी किसी को बाँधती नहीं,
वह तो बस चुपचाप दुआ बनकर
उम्रभर साथ चलती रहती है।
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